lunar roving vehicle first used on moon
- फोटो : NASA
चांद के दक्षिणी ध्रुव पर ऐसे कई क्रेटर हैं, जहां करोड़ों सालों से सूर्य की रोशनी नहीं पहुंची है। इस कारण चंद्रमा का यह क्षेत्र हानिकारक रेडिएशन से लंबे समय से बचा हुआ है। कई वैज्ञानिकों का तो यह तक कहना है कि इन जगहों पर अत्यंत कठिन परिस्थितियों में रहने वाले सूक्ष्म जीवों की मौजूदगी हो सकती है। हालांकि, इन दावों में कितनी सच्चाई है? इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है।
वैज्ञानिक खोजबीन में ऐसे कई जीवों के बारे में पता चला है, जो कि अंतरिक्ष की कठिन परिस्थितियों में भी जिंदा रह सकते हैं।
अंतरिक्ष की कठिन परिस्थितियों में भी जिंदा रहे सकते हैं ये जीव
कुछ सालों पहले हुए एक्सपेरिमेंट में Deinococcus Radiodurans और Tardigrades को इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से अंतरिक्ष में छोड़ा गया था। गौर करने वाली बात यह है कि अंतरिक्ष की कठिन परिस्थितियों और रेडिएशन में भी इन जीवों को कुछ नहीं हुआ। ये आसानी से वहां भी जिंदा थे।
वहीं आने वाले समय में नासा आर्टेमिस मिशन के अंतर्गत दोबारा चांद पर इंसानों को उतारने जा रहा है। ऐसे में नासा के इस मिशन में नील हरित शैवाल यानी साइनोबैक्टीरिया की बहुत बड़ी भूमिका होने वाली है।
lunar roving vehicle first used on moon
- फोटो : NASA
नील हरित शैवाल (साइनोबैक्टीरिया) और चांद
नील हरित शैवाल जिसे की साइनोबैक्टीरिया के नाम से भी जाना जाता है। कई रिसर्च में इस बारे में पता चला है कि पृथ्वी के शुरुआती वातावरण को बदलने में इन्होंने बड़ी भूमिका निभाई थी। इन्होंने ही प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया से पृथ्वी के वातावरण में ऑक्सीजन को छोड़ा। ऑक्सीजन की मौजूदगी के बाद ही पृथ्वी पर जटिल जीवन की शुरुआत हुई।
क्रमागत विकास की उन्नति के कारण ही आज इंसानों की एक कॉम्पलेक्स लाइफ फॉर्म हुई। इसमें ऑक्सीजन का बहुत बड़ा योगदान है। हमारे सोचने के तरीकों से लेकर हमारी बनावट और बाकी चीजों में क्रमागत उन्नति ही काम कर रही है।
आज के समय क्रमागत उन्नति के विकास ने हमारी मेधा को उस स्तर पर पहुंचा दिया है, जहां हम खुद अंतरिक्ष में यात्रा कर सकते हैं और सुदूर अंतरिक्ष में सफर करने वाले वॉयजर जैसे यान भी भेज चुके हैं। यही नहीं अब तो चांद, मंगल और कई दूसरे उपग्रहों को कॉलोनाइज करने की योजना बनाई जा रही है। एक समय पृथ्वी पर कॉम्पलेक्स लाइफ फॉर्म करने में जिस साइनोबैक्टीरिया ने बड़ी भूमिका निभाई थी। अब चांद और मंगल ग्रह को कॉलोनाइज करने में इसकी काफी ज्यादा जरूरत हम लोगों को है।
नासा साल 2025 में अपने आर्टेमिस मिशन के अंतर्गत चांद के दक्षिणी ध्रुव पर इंसानों को उतारने जा रहा है। ऐसे में इस सेलेस्टियल बॉडी को कॉलोनाइज करने में साइनोबैक्टीरिया का एक अहम किरदार होगा।
कई रिसर्च में इस बारे में पता चला है कि साइनोबैक्टीरिया चांद की मिट्टी में आसानी से पनप सकते हैं। नासा के कई एक्सपेरिमेंट में चांद की मिट्टी (regolith) में पौधों को उगाने में सफलता मिली है।
आने वाले समय में चांद की सतह पर उतरने वाले एस्ट्रोनॉट साइनोबैक्टीरिया की मदद से चांद की सतह से संसाधन इकट्ठा कर सकते हैं। इन संसाधनों का इस्तेमाल रॉकेट फ्यूल और वहां पर एक कस्टमाइज एन्वायरोमेंट में फसल उगाने में किया जा सकता है। इसके अलावा बायोमाइनिंग में भी साइनोबैक्टिरीया को उपयोग में लाया जाएगा।
क्लोज्ड लाइफ लूप सपोर्ट सिस्टम में साइनोबैक्टेरिया की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होने वाली है। ये एस्ट्रोनॉट द्वारा छोड़े गए कार्बनडाइ ऑक्साइड को रिसाइकिल करके दोबारा उसे ऑक्सीजन में बदल सकते हैं। यही नहीं साइनोबैक्टिरीया चांद की मिट्टी (regolith) को और अधिक उपजाऊ बनाने का काम करेंगे, जिसके चलते उसमें पौधों को उगाया जा सकेगा।