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तालिबान ने जहां लगाई फांसी वहां फल रहे हैं लिफ्टर

Wed, 09 Jan 2013 11:43 PM IST
मोदीनगर/हेमंत रस्तोगी
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तालिबानियों ने कभी जिस स्थान पर लोगों को फांसी पर झुलवा दिया आज वहीं वेटलिफ्टिंग हॉल खड़ा है। काबुल बदल रहा है लेकिन तालिबान का खौफ बरकरार है। अपने देश में वेटलिफ्टिंग की जड़ें मजबूत करने के लिए नेशनल वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में आए अफगानिस्तान वेटलिफ्टिंग फेडरेशन के अध्यक्ष मरवान मायान का दर्द छलक पड़ता है। उनके मुंह से यही निकलता, यह तालिबान का खौफ ही है कि उनके बुलावे के बावजूद वेटलिफ्टरों को ट्रेनिंग देने कोई विदेशी कोच नहीं आना चाहता है।
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इस चैंपियनशिप में रेफरी और जूरी मेंबर की भूमिका निभाने वाले मरवान के मुताबिक उनके देश में हालात बदल रहे हैं। लेकिन खेलों में सिर्फ पढ़े लिखे तबके के लोग आ रहे हैं या फिर वहां से जहां सरकारी दखल है। 2010 के ढाका सैफ खेलों में उनकी टीम दुआ कर रही थी कि अल्लाह एक मेडल दे दो। यहां 77 किलो में मोहम्मद मुस्तफा कारमान की ओर से जीता गया कांस्य पदक उनके लिए गोल्ड के समान था। दो साल बाद मार्च 2012 में नेपाल गंज में हुई सैफ चैंपियनशिप में अफगानिस्तान ने प्लस 105 में मोहम्मद हुसैन हुसैनी के गोल्ड के साथ कुल 15 पदक जीते।

यह सब उस वेटलिफ्टिंग हॉल का कमाल था जिसे सरकार ने बनवाया। लेकिन दिक्कत विदेशी कोच को लेकर है। वह अफगानिस्तान जाकर नेशनल ओलंपिक कमेटी से कहेंगे कहीं से कोच नहीं आ रहा है तो भारत से कोच बुला लें। उन्होंने पड़ोसी मुल्क उजबेकिस्तान के कोच को अपने यहां आने को कहा था लेकिन तालिबान के चलते उन्होंने इंकार कर दिया। अभी पुराने अफगानी कोचों से काम चलाया जा रहा है। सच्चाई यह है कि तालिबान खेलों के खिलाफ है।
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जिस जगह नेशनल ओलंपिक कमेटी का दफ्तर और आज का वेटलिफ्टिंग हॉल है वहां तालिबानियों ने लोगों को फांसी पर लटकाया था। लेकिन लंदन ओलंपिक में ताईक्वांडो में जीते गए कांस्य पदक की बदौलत लोगों में खेलों के प्रति रुचि बढ़ी है। सरकार ने अपना स्पोर्ट्स चैनल भी खोला है। मरवान यही कहते हैं कि अफगानिस्तान को ताईक्वांडो सरीखी विश्वस्तरीय सफलता की दरकार है लेकिन इसके लिए उन्हें एक अदद विदेशी कोच की जरूरत है। काश कोई इसके लिए तैयार हो जाए।
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