विश्व यूथ वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में देश को पहली बार स्वर्ण पदक दिलाने वाले 16 साल के सेनापति गुरुनायडु को कभी दो वक्त का खाना नसीब नहीं होता था। पिता दूसरे के खेतों में काम करते थे और गुरुनायडु को वेटलिफ्टिंग का शौक लग चुका था। वेटलिफ्टिंग के लायक खाना नहीं मिलने के बावजूद गुरुनायडु ने इस खेल को नहीं छोड़ा। उनके भाई सेनापति रामकृष्ण उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे। आखिर उनकी यह मेहनत रंग ला गई। उन्होंने स्नैच (104 किलो) में अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर 55 भार वर्ग का स्वर्ण अपने नाम किया। उन्होंने कुल 230 किलो वजन उठाया। गुरुनायडु ने मैक्सिको से अमर उजाला को बताया कि उनके लिए यह स्वर्ण बेहद अहम है। कभी सोचा नहीं था कि इतनी गरीबी के बावजूद इस खेल को जारी रख पाऊंगा।
आर्मी ब्वाएज में जाने से दूर हुई दिक्कतें
आंध्र प्रदेश के विजयनगरम जिले में पड़ते चंद्रमपेटे गांव के गुरुनायडु बताते हैं कि वह 11 साल के थे तो स्कूल में सीनियर को वेटलिफ्टिंग करते देखा। यहीं से उन्होंने यह खेल करने की ठान ली। शुरुआत में काफी दिक्कतें आईं। इस खेल के लायक खाना नहीं मिलता था, लेकिन भाई उन्हें निराश नहीं होने देते थे। 2017 में आर्मी ब्वाएज, सिकंदराबाद में उनका चयन हो गया। यहां जाने के बाद उनकी खाने की दिक्कतें दूर हुईं। तब उन्होंने दोगुनी मेहनत शुरू कर दी। गुरुनायडु खुद वेटलिफ्टिंग करते हैं, लेकिन उनका छोटा भाई बॉक्सिंग कर रहा है।