इंग्लैंड की फिजाओं में खेल के रोमांच को बाआसानी सूंघा जा सकता था। जहां लॉर्ड्स के मैदान में इंग्लैंड खुद अपने ही ईजाद किए खेल का विश्व खिताब जीतने को बेताब था, वहीं लॉर्ड्स के उस ऐतिहासिक क्रिकेट मैदान से महज 15 किलोमीटर दूर विम्बलडन में घास के मैदान पर रोजर फेडरर और नोवाक जोकोविच अपनी बादशाहत साबित करने के लिए भिड़ रहे थे।
1975 से अब तक क्रिकेट के 12 विश्व कप हो गए हैं, पर इंग्लैंड जीत के लिए तरसता रहा। न्यूजीलैंड पीछे से आकर ऊपर पहुंच गया था, पर दिल उसके साथ थे। खेल भी न्यूजीलैंड ने जीवट के साथ दिखाया। बात सुपर ओवर तक गई पर आखिर इंग्लैंड ने विश्व कप को चूम लिया। क्योंकि किसी को तो जीतना ही था। तकनीकी तौर पर न्यूजीलैंड की टीम हारी ज़रूर, पर दिल जीत गई| खुद बेन स्टोक्स के चेहरे पर इस अधूरी जीत का मलाल देखा जा सकता था|
वहीं घास के मैदान पर 4 घंटे 57 मिनट लंबे चले विम्बलडन के फाइनल में कई दिल थाम लेने वाले लम्हों से गुजरते हुए आखिर कप को जोकोविच ही चूम पाए। क्रिकेट और टेनिस रविवार के दोनों ही शीर्ष मुक़ाबलों ने इस कहावत को झुठलाने की कोशिश की - जो जीता वही सिकंदर!
नोवाक ने जीत के बाद जिस भाव से सेंटर कोर्ट की दूब को अपने होंठों से चूमते हुए हलक में उतारा, वो ये बताने के लिए काफी है के ये सर्बियाई चैम्पियन इस जीत से कितना रोमांचित है। ये सर्बियाई लड़ाका इस मैच को जिंदगी भर याद रखना चाहता था। वो चाहता था कि ये क्षण और ये जीत उसके लिए अविस्मरणीय बन जाए। इसीलिए उसने उस मैदान से घास को उठा कर चबा लिया ताकि वो सदा के लिए उसके रक्त और मज्जा का हिस्सा बन जाए! वो ऐसा करें भी क्यों ना....वो ग्रास कोर्ट के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के मुंह से जीत छीन कर ले आए थे। जीत का ये स्वाद उन्होंने कितनी मेहनत से चखा ये तो दुनिया ने देखा। फेडेक्स के नाम से अपने चाहने वालों के दिलों पर राज करने वाले स्विट्जरलैंड के रोजर फेडरर की जीत के लिए मानो हर कोई इबादत कर रहा था।