तमिलनाडु के गरीब तबके से उठकर 2006 के दोहा एशियाई खेलों में 10 हजार मीटर का रजत पदक जीतने के बाद भी शांति सुंदरराजन को शोहरत नहीं मिली। लेकिन यह पदक जीतने के दो दिन बाद जब वह जेंडर टेस्ट में फेल हुईं तो उन्हें बदनामी के तौर पर दुनिया जान गई।
महिला होने के बावजूद उनमें पुरुषत्व के लक्षण बताए गए। उनका मेडल तो गया साथ ही उन्हें ईंटों के भट्ठों पर काम करना पड़ा। लेकिन साई ने इस एथलीट की स्थिति पर दया खाते हुए शांति को कोच बनाने की तैयारी कर ली है।
नियमों से उलट साई ने कोचिंग के डिप्लोमा कोर्स के लिए शांति का आवेदन स्वीकार कर लिया है। हालांकि साई किसी भी तरह के विवादों से बचने के लिए शांति को डिप्लोमा करने वाले दूसरे पूर्व खिलाड़ियों के साथ हॉस्टल में नहीं बल्कि अलग कमरे में रखेगी।
यही साई ने शांति की उस अपील को भी स्वीकार कर लिया है जिसमें उन्होंने एनआईएस पटियाला के बजाय बंगलूरू में डिप्लोमा करने की बात कही है। साई के महानिदेशक जीति थामसन ने अमर उजाला को बताया कि उन्हें बंगलूरू भेजा जाएगा। साथ ही उन्होंने शांति को अलग कमरे में रखने के प्रावधान की भी पुष्टि की।
शांति ने साई से प्रार्थना की है कि वह तमिलनाडु की रहने वाली हैं। उनका घर बंगलूरू से नजदीक पड़ता है। जिसके चलते उन्हें बंगलूरू में एडमीशन दिया जाए। हालांकि अभी एडमीशन के लिए इंटरव्यू शुरू नहीं हुए हैं। तीन जुलाई को डिप्लोमा कोर्स के लिए जरूरी टेस्ट व इंटरव्यू होंगे।