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पैरा एशियन गेम्स: पीएम मोदी ने पैरा एथलीट रिंकू हुड्डा को जमकर सराहा, मां के निधन के बाद जीता था गोल्ड

Thu, 05 Nov 2026 06:22 PM IST
शोभित चतुर्वेदी स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को पैरा एशियन गेम्स के पदक विजेताओं से मुलाकात की। पीएम मोदी ने इस दौरान भाला फेंक एथलीट रिंकू हुड्डा को जमकर सराहा। पैरा एशियाड से पहले रिंकू की मां का निधन हो गया था।
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पीएम मोदी और रिंकू हुड्डा - फोटो : IANS
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विस्तार
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एशियन पैरा गेम्स 2026 में भारत के भाला फेंक खिलाड़ी रिंकू हुड्डा ने गोल्ड मेडल जीतकर देश का मान बढ़ाया। एशियन पैरा गेम्स से दो महीने पहले मां का निधन होने के बावजूद रिंकू ने हिम्मत नहीं हारी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी रिंकू की जमकर सराहना की है। गुरुवार को नई दिल्ली के इंदिरा गांधी स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में पीएम मोदी ने एशियन पैरा गेम्स 2026 में देश का मान बढ़ाकर लौटे खिलाड़ियों संग मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने पैरा खिलाड़ियों के प्रदर्शन की खूब सराहना की। प्रधानमंत्री मोदी ने खासतौर पर रिंकू के साहस और हिम्मत की तारीफ की।
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पैरा एशियाड से पहले हुआ था मां का निधन 
पीएम मोदी ने कहा, रिंकू ने एशियन पैरा गेम्स से दो महीने पहले अपनी माता जी को खो दिया था। इतने बड़े दुख के बीच भी उन्होंने हिम्मत बनाए रखी और जब उन्होंने गोल्ड मेडल जीता तो अपनी मां की तस्वीर उठाकर वो मेडल समर्पित किया। वो पल सभी देशवासियों को भावुक कर गया।

रिंकू ने एशियन पैरा गेम्स में गोल्ड जीतने के बाद अपनी मां की तस्वीर दिखाई थी और यह पल हर किसी का भावुक कर गया था। रिंकू की मां का निधन आठ अगस्त को हुआ था, जिसके बाद उनके लिए एशियन पैरा गेम्स की तैयारियां करना बेहद चुनौतीपूर्ण रहा। पीएम मोदी ने बताया कैसे 2014 के बाद सरकार ने खेलों पर विशेष ध्यान दिया।

उन्होंने कहा, हमने तय किया कि हम अपने युवाओं की प्रतिभा को बर्बाद नहीं होने देंगे। इसलिए जो सिस्टम आप जैसे युवाओं को आगे बढ़ने से रोकता था, हमने उस सिस्टम को बदलने का संकल्प ले लिया। इसी का नतीजा है, खेलों को लेकर नई अप्रोच पैदा हुई है। आज अगर एक युवा को अपने टैलेंट पर भरोसा है, तो उसे ये विश्वास भी रहता है कि देश उसके साथ खड़ा रहेगा।
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पीएम ने खिलाड़ियों को किया संबोधित 
प्रधानमंत्री ने आगे कहा, 2014 के बाद जब देश ने बड़े लक्ष्यों के लिए अपना सफर शुरू किया था, तब हालात एकदम अलग थे। ज्यादातर पैरेंट्स बच्चों को खेलों में भेजने से डरते थे और खुद भी डरते थे। व्यवस्था की बदहाली, संसाधनों की कमी, सपोर्ट का अभाव, पारदर्शिता की कमी, लोग कहते थे कि इस सिस्टम का कुछ नहीं हो सकता। ऐसे ही चलेगा। मगर जैसे आपने किसी भी मुश्किल के सामने हार नहीं मानी, वैसे ही देश ने भी केवल अपने लक्ष्य की ओर देखा।
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