आजादी के बाद भारत में हर सिरे से नई शुरुआत हो रही थी खेलों के मामले में भारत ने 1951 में पहले एशियाई खेलों की मेजबानी सफलतापूर्व कर दुनिया को संदेश दे दिया था कि भारत खेलों के मामले में कमजोर नहीं रहने वाला है। भारतीय राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में खेलों के भी अहम भूमिका होगी। ऐसे में खेल के क्षेत्र में भारत अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहा था। जिसमें हॉकी के अलावा, मिल्खा सिंह पर पूरे देश का ध्यान केंद्रित था।
ऐसे में आजादी के 11वें साल भारत को पहली बार विश्वचैंपियन बनाने का कारनामा विल्सन जोन्स ने किया। विल्सन जोन्स एंग्लो इंडियन थे और बिलियर्ड्स के शानदार खिलाड़ी थे। 1958 में बिलियर्ड्स विश्व चैम्पियनशिप जीतने पर विल्सन जोन्स ने कहा था, “विश्व खिताब पहली बार भारत के हाथ आया था, इसलिए मैं पक्के तौर पर कह सकता हूं कि मेरे जीवन का यह सबसे खुशी का पल था।”
विल्सन को बचपन में कंचे खेलने का बहुत शौक था। वह इस खेल में माहिर थे। इसके अलावा वो अपने अंकल को खिड़की से झांककर बिलियर्ड्स खेलता देखते थे। इस काम में उन्हें बहुत आनंद आता था। कम उम्र के कारण उन्हें बिलियर्ड्स रूम में जाने की इजाजत नहीं थी। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि वह जिस खेल को पास से देखने को तरसते थे, एक दिन उस खेल के राजा कहलायेंगे।
साल 1922 में महाराष्ट्र के पुणे में जन्मे विल्सन लायनेल गार्टन जोन्स ने साल 1962 में दोबारा विश्व चैंपियनशिप खिताब हासिल किया। इसके बाद भारत सरकार ने उन्हें साल 1962 में अर्जुन पुरस्कार, 1965 में पद्मश्री, 1990 में महाराष्ट्र सरकार ने ‘महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार’ तथा 1996 में ‘द्रोणाचार्य पुरस्कार’ से नवाजा गया। दो बार विश्व चैंपियन रहे जोन्स 12 बार बिलियर्डस और पांच बार स्नूकर के नेशनल चैंपियन रहे इनकी मृत्यु 5 अक्टूबर, 2003 में हुई।