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जसदेव सिंह: वो सुनहरी आवाज, जो बिना हिंदी पढ़े बने हिंदी के कमेंटेटर

Wed, 26 Sep 2018 11:37 AM IST
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला
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जसदेव सिंह और हॉकी कमेंटरी को भारत में एक-दूसरे का पर्याय माना जाता था। वो आवाज अब खामोश हो गई है। लंबे वक्त तक बीमारी से जूझने के बाद 87 साल के जसदेव सिंह ने मंगलवार को दिल्ली में आखिरी सांस ली। उनका अंतिम संस्कार बुधवार को उनके बेटे गुरदेव सिंह के आने के बाद किया जाएगा।

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1970 और 80 के दशक में दूरदर्शन की स्पोर्ट्स कवरेज बेहतरीन होती थी। रवि चतुर्वेदी और सुशील दोशी के साथ जसदेव सिंह का नाम भी घर-घर में जाना जाता था।

उन्होंने अपने करियर में नौ ओलंपिक, आठ हॉकी विश्व कप और छह एशियाई खेल कवर किए हैं। उन्हें ओलंपिक ऑर्डर का भी सम्मान मिला जो ओलंपिक का सबसे बड़ा सम्मान है।

बीबीसी के वरिष्ठ पत्रकार रेहान फजल से 1997 में जसदेव सिंह से बातचीत के कुछ अंश, उन्हीं की जुबानी

हिंदी कभी पढ़ी नहीं लेकिन बने हिंदी कमेंटेटर

1948 में जब गांधी जी की हत्या हुई थी तो उनकी अंतिम यात्रा का जो आंखों देखा विवरण था उसे मैंने रेडियो पर अंग्रेजी में सुना था। तब मैं दसवीं कक्षा में था। कमेंटेटर के जो शब्द और भावनाएं थीं, वो ऐसी मेरे दिल में उतर गई कि मैंने मेरी मां से कहा कि मैं तो हिंदी में कमेंटरी करूंगा।

आपको ये भी ताज्जुब होगा कि मैंने कभी हिंदी पढ़ी ही नहीं थी। मैंने उर्दू में पढ़ाई की थी और बाद में अंग्रेजी में। लेकिन कमेंटरी के शौक ने मुझे हिंदी भी सिखला दी।

विश्व कप मैच में आखिरी 10 मिनट

1975 विश्व कप में भारत और मलेशिया का सेमीफाइनल चल रहा था और मलेशिया 2-1 से आगे था। आखिरी 10 मिनट बचे थे। उस वक्त डिमेलो माइक्रोफोन पर थे।

मैंने देखा कि असलम शेर खां वार्मअप कर रहे थे। असलम को मैंने यूनिवर्सिटी में खेलते देखा था। तेहरान में खेलते देखा था। असलम में एक ललक दिखती थी।

जब मैंने उन्हें वार्मअप करते देखा तो मैंने बोला कि हो सकता है असलम को मैदान में बलबीर सिंह और कप्तान अजीत पाल बुला लें और तभी असलम कुलाचे भरते हुए मैदान में आते दिखे। अपने दाएं हाथ में हॉकी स्टिक लिए उन्होंने ऐसे छलांग लगाई जैसे हिरण लगाता है।

उन्हें देखकर मेरे मुंह से निकला कि असलम मैदान पर भारत का भाग्य बनकर आए हैं। उन्होंने अपना ताबीज चूमा और एक मिनट के अंदर ही भारत को पेनल्टी कॉर्नर मिल गया। असलम ने गोल किया और भारत बराबरी पर आ गया।

मुझे इसलिए भी याद रहता है क्योंकि पाकिस्तान के अखबारों ने लिखा था कि भारतीय कमेंटेटर को ये नजर आ गया कि असलम ने ताबीज को चूमा लेकिन पाकिस्तान के कमेंटेटर को नजर नहीं आया।

फिर फाइनल में तो हम अच्छा खेले ही। पाकिस्तान ने भी अच्छा खेला लेकिन वो अवसरों को कैश नही कर पाए। हमारे अशोक कुमार ने शानदार गोल किए।

भारतीय टीम को लेकर आम शिकायत

ड्रिबलिंग की बात करें तो कमेंटेटर को तारीफ करने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि कमेंटेटर अगर गेंद के साथ रहेगा तो श्रोताओं को खुद ही पता चल जाएगा कि ड्रिबलिंग कौन ज्यादा कर रहा है।

कई लोग आलोचना भी करते कि इस खिलाड़ी ने बहुत देर गेंद रख ली। मेरे हिसाब से वैसा नहीं है। मैंने जो कमेंटरी को लेकर सीखा है वो ये कि जो हो रहा है बस लोगों को वो बता दो। जो होना चाहिए था, वो बताने का हमको कोई अधिकार नहीं। जो हुआ ही नहीं, उसको कैसे बताएं। या तो मैं बहुत बड़ा खिलाड़ी रहा हूं कि उनके खेल पर बोल सकूं।

मुझे कई खिलाड़ियों ने कहा कि आप बल्ला या स्टिक लेकर आइए तब पता चलेगा। मुझे लगता है कि वो ठीक कहते हैं। मैंने भी उनसे कहा कि आप भी माइक्रोफोन पर आकर बैठो। भारत में एक ये आम शिकायत रही है कि ड्रिबलिंग ज्यादा करते हैं क्योंकि गोल करने वाले को ज्यादा प्रचार मिलता है। उसकी ज्यादा तारीफ होती है।

भारत की कौन सी हॉकी टीम बेहतरीन थी?

सबसे अच्छी टीम तो वही होगी जो जीतेगी। जो गोल करने के अवसरों को कैश कर ले, वही तो अच्छी टीम होगी। सबसे अच्छी टीम 1964 वाली थी जब हमने ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता और फिर 1975 में जब हमने विश्व कप जीता।

सबसे अच्छा फॉरवर्ड कौन?

टीम जब टीम होकर खेले तभी फॉरवर्ड आगे बढ़ सकता है। जब ध्यानचंद खेलते थे तो उन्हें रूप सिंह, दारा जैसे खिलाड़ियों का साथ मिलता था। फॉरवर्ड खिलाड़ी चाहे राइट विंग खेले या लेफ्ट विंग खेले, अगर उन्हें बराबर फीडिंग होती रही, तभी उन्हें कामयाबी मिली, इसलिए अगर मैं सिर्फ एक खिलाड़ी की तारीफ करूं तो उचित नहीं होगा।

हॉकी कमेंटरी क्यों खास थी
मेरे लिए तो हर खेल बराबर है। बस लोगों ने मुझे हॉकी में ज्यादा पसंद कर लिया। क्रिकेट, बैडमिंटन और कबड्डी में अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में मैंने कमेंटरी की।

लेकिन हॉकी एक तेज रफ्तार खेल है। हम उसमें जीतते भी रहे। अपना राष्ट्रीय खेल भी मानते रहे। किसी खेल की अच्छे से जानकारी होना बहुत जरूरी है। मैं नए नियम भी पढ़ता रहता हूं इसलिए लोगों का प्यार है कि मुझे हॉकी में पसंद किया, लेकिन मुझसे पूछे तो मुझे सबसे ज्यादा हॉकी, एथलेटिक्स और क्रिकेट की कमेंटरी करना पसंद है।
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आजकल के कमेंटेटर में वो बात कहां?

जो मैंने सीखा है पिछले 30-35 साल में और डिमेलो जैसे कमेंटेटर से, वो ये कि दो चीजें बराबर होनी चाहिए - खेल का ज्ञान और भाषा। भाषा का व्याकरण, शब्दों का चुनाव, रफ्तार और फिर जैसे आप सब्ज़ी में नमक-मिर्च डालते हैं, वैसे ही किसी मौके पर श्रोताओं को ऐसी बात बताई जाए जिससे उन्हें लगे कि हां कमेंटेटर वहां पर है।

जैसे आप लंदन से कमेंटरी कर रहे हैं तो लंदन के बारे में बताएं, यहां के लोगों के बारे में बताइए। यहां की परंपराओं के बारे में बताइए। लेकिन खेल की कीमत पर नहीं। हां, अगर खेल को दिलचस्प बनाना है तो जैसे किसी तस्वीर को आप फ्रेम कर देते हैं तो और सुंदर लगती है तस्वीर। वैसे ही इन चीजों को शामिल कीजिए।

वो आजकल के नौजवान कमेंटरी नहीं कर पाते। भले ही वे ये कह लें कि गेंद फलाने ने फलां को दी। यहां पास कर दी, वहां पास कर दी।
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