नीरज को अच्छी तरह याद है आठ साल पहले जब उन्होंने जेवेलिन थ्रो शुरू किया था तो दो-तीन साल प्रदर्शन अच्छा नहीं था। कहीं भी कोई पोजीशन नहीं आती थी। तब भी उन्होंने अभ्यास किया और धैर्य को बनाए रखा। नीरज कहते हैं कि उन्हें बस अपने पर विश्वास था। उनके पिता गांव से 15.16 किलोमीटर पानीपत के स्टेडियम उनकी फिटनेस ठीक कराने के लिए ले जाया करते थे।
उन्हें खुद नहीं मालूम था कि वह जेवेलिन थ्रोअर बनने वाले हैं। बचपन में कुश्ती और कबड्डी ही देखा है, लेकिन स्टेडियम में अंतरराष्ट्रीय जेवेलिन थ्रोअर जयवीर सिंह को देखा। उन्होंने ही सलाह दी कि जेवेलिन शुरू करो तो बस उसी वक्त भाला उठा लिया।
नीरज बताते हैं कि उनके परिवार में कोई भी खिलाड़ी नहीं था। उन्हें भी शुरूआत में नहीं मालूम था कि वह खेलों में उतरेंगे या नहीं था। सच्चाई यह है कि उनका खिलाड़ी बनना ही पक्का नहीं था। पहली बार जयवीर को देख जेवेलिन शुरू किया और उसी को अपना लिया।
इस दूरी पर आ सकता है ओलंपिक मेडल
नीरज का कहना है कि इस वक्त विश्व स्तर पर उनकी रैकिंग छह या सात है। जर्मनी के तीन तीन थ्रोअर एथलीट 90 से ऊपर। 88 से 90 तक की थ्रो पर ओलंपिक में मेडल नहीं आने का अवसर एक प्रतिशत ही है। वरना इतनी दूरी पर मेडल आ जाता है।