विक्रम ने 14 साल पहले एक सड़क हादसे में अपना पैर गंवा दिया था। तब बीए प्रथम वर्ष के छात्र विक्रम 28 मई 2005 को बाइक से जिम में जा रहे थे। चिराग दिल्ली चौराहे पर तेज रफ्तार से आ रहे ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी। हादसे में उनका एक पैर खराब हो गया। दो साल बिस्तर रहे।
डॉक्टर्स ने सत्तर फीसदी दिव्यांगता का सर्टिफिकेट देकर घर भेज दिया। उन्हें लगा कि जिंदगी खत्म हो गई, पर उन्होंने हार नहीं मानी। कड़ी मेहनत से उन्होंने फिर जिम में अभ्यास शुरू किया और अपनी मंजिल की ओर कदम बढ़ा दिए।
मां के साथ ही अंकल अरुण गर्ग ने भी विक्रम का हौसला बढ़ाया। इस बीच 2016 में विक्रम की सौम्या से शादी हुई। सौम्य एक पांव से पोलियाग्रस्त हैं। इनका एक बच्चा भी है। पत्नी ने कभी यह अहसास नहीं होने दिया कि हम दिव्यांग हैं।
राजीव गांधी अवार्डी कोच जुगल धवन ने विक्रम के सपने को साकार करने में मदद की। विक्रम हर बुधवार और शनिवार को बस से सोनीपत कोचिंग के लिए जाते हैं।
विक्रम को अफसोस है कि तमाम कोशिशों के बाद भी उसे सरकारी नौकरी मिली। इतना ही नहीं प्राइवेट क्षेत्र में किसी ने कोई मदद की। रेलवे और बैंक में कई बार प्रयास किए मगर सफलता नहीं मिली।
जिम में ट्रेनर की नौकरी मांगने पर भी किसी ने काबिल नहीं समझा। आर्थिक परेशानी के बावजूद विक्रम के इरादे बुलंद हैं। वह कहते हैं खाना एक समय मिला तो भी ठीक।अब पीछे नहीं हटूंगा।मेरा लक्ष्य है कि डेढ़ सौ किलो या उससे ऊपर तक की बैंच प्रेस मारना। मेरा लक्ष्य देश के लिए विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण जीतना है और इसे मैं हासिल करके ही रहूंगा।