उन्होंने कहा, 'मैंने अपने भाई को देखकर मुक्केबाजी में कदम रखा था, वह मेरे कोच भी हैं। यह बात 2010 की है। दरअसल, मेरे लिए यह पढ़ाई लिखाई से बचने का तरीका था। मुझे पढने में कोई दिलचस्पी नहीं थी और मेरे माता-पिता वास्तव में चाहते थे कि मैं पढ़ाई पर ध्यान दूं।' उन्होंने बताया, 'शुरू में परिवार के लोगों ने खेल में जाने से मना किया लेकिन जब मैं पदक जीतने लगा तब वह मान गए। जब मैं राज्यस्तरीय चैंपियन बना था तब वे काफी गर्व महसूस कर रहे थे।'
सेना के इस जवान के खेल में सुधार से कोच सीए कुट्टप्पा भी काफी प्रभावित है। उन्होंने बताया, 'वह कुछ साल पहले तक सिर्फ दमदार लगने पर विश्वास करता था और अब उसने 2018 में लेविट से मिली हार को काफी पीछे छोड़ दिया है। हमने रिंग में उसकी गति और मुक्कों पर भी काम किया है।
संजीत ने 2019 में रूस में हुए विश्व चैम्पियनशिप के क्वार्टरफाइनल में पहुंच कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनावाया था। कंधे की चोट के कारण वह ओलंपिक क्वालीफायर के लिए नहीं जा सके। कुट्टप्पा ने कहा, 'यह उसका दुर्भाग्य है। वह उस टूर्नामेंट में जाता तो अच्छा होता। अगर वह सीधे क्वालीफाई नहीं करता, तो भी उसके पास रैंकिंग के जरिये ऐसा करने का मौका होता।'