खेलो इंडिया स्कूल गेम्स (केआईएसजी) में देश के अलग-अलग राज्यों से आए बच्चों ने जमकर हिस्सा लिया। इसमें कई बच्चे ऑटो रिक्शा चलाने वाले परिवार से थे, कई किसान के बच्चे थे तो किसी के माता-पिता सब्जी विक्रेता थे। इन बच्चों ने अपनी प्रतिभा का हुनर दिखाकर सबको दांतों तले अंगुली दबाने पर मजबूर कर दिया।
खेल मंत्रालय की ओर से हाल में आयोजित पहले
खेलो इंडिया स्कूल गेम्स में 3507 बच्चों ने शिरकत की। भारोत्तोलन में स्वर्ण पदक जीतने वाले ओडिशा के 15 वर्षीय भक्तराम देस्ती के माता-पिता किसान हैं और वह पिछड़े इलाके से आते हैं। देस्ती के माता-पिता के पास एक छोटा सा जमीन का टुकड़ा है। उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। देस्ती के कोच सीता जेना ने कहा, ‘देश के उस हिस्से से आने वाले लोगों के लिए बहुत कम मौके हैं। वह अपनी पढ़ाई और प्रशिक्षण को इसलिए जारी रखा है क्योंकि जहां वह पढ़ाई कर रहा है वह सरकारी स्कूल है और वहां होस्टल की व्यवस्था है।’
मुक्केबाजी की 60 किग्रा स्पर्धा में रजत पदक जीतने वाले मणिपुर के नोंग्बाम खोंबा सिंह के पिता दीवार पर पेंट करने का काम करते हैं। खोंबा इंफाल से 100 किलोमीटर दूर एक पिछड़े गांव से ताल्लुक रखते हैं। वह तीन भाई-बहनों में सबसे बड़े हैं। उनके परिवार में 17 साल के खोंबा एकमात्र मुक्केबाज हैं।
बकौल खोंबा, ‘मेरे पिता पेंटर हैं। वह कोई खिलाड़ी नहीं हैं लेकिन उन्होंने मेरा हमेशा साथ दिया है। आज मैं जो कुछ भी हूं अपने पिता और कोच श्याम चंद्र सर की बदौलत हूं।’ कुछ इसी तरह की कहानी भाला फेंक एथलीट विकास यादव और अर्पित यादव की है। विकास भदोही के कोल्हापुर से हैं। अर्पित किसान के परिवार से आते हैं। वह छह भाई-बहन हैं। उनके माता-पिता को दैनिक जरूरतों को पूरा करने में कठिनाई होती थी।