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कभी होटल में काम करती थी कविता, अब एशियन गेम्स 2018 में तिरंगा फहराने को तैयार

Sat, 18 Aug 2018 03:16 PM IST
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला
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कविता ठाकुर किसी पहचान की मोहताज नहीं। अपने मेहनत के दम पर भारतीय महिला कबड्डी टीम में जगह बनाने वाली कविता की संघर्ष भरी दास्तां आपको किसी फिल्मी कहानी की याद दिला सकती है। अब शनिवार से शुरू हो रहे एशियाई खेलों में देश को कबड्डी टीम से गोल्ड और साथियों को कविता से बेहतरीन प्रदर्शन की उम्मीद होगी।

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बेहद गरीब परिवार में पली-बढ़ी कविता के लिए इस मुकाम तक पहुंचना आसान नहीं था। हिमाचल की हांड़ कंपा-कंपा देने वाली सर्दियों में न तन पर गर्म कपड़ा होता था और न रात में सोने के लिए कंबल। इन हालातों से पार पाते हुए कविता ने न सिर्फ गरीबी की जंजीरों को तोड़ा बल्कि अब अंततराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय टीम की नुमाइंदगी भी कर रहीं हैं।

पानी जमा देने वाली सर्दी में जिंदगी की जंग

Kavita thakur
हिमाचल प्रदेश के मनाली की रहने वाली कविता का अधिकतर जीवन एक ढाबे में ही गुजरा। मनाली से 6 किमी दूर जगतसुख गांव में स्थित यह ढाबा उनके पिता पृथ्वी सिंह चलाते हैं। मां कृष्णा देवी चाय बनाने और खाने-पीने का समान तैयार करती हैं। बड़ी बहन कल्पना भी गरीबी से लड़ने के लिए मां-बाप का हाथ बंटाया करती थी।

घर की खराब स्थिति और जीविकोपार्जन का एकमात्र सहारा रहे ढाबे में कविता भी काम करने लगी। खेलने कूदने की उम्र में उनका सारा बचपन बर्तन धोने और जूठन साफ करने में गुजर गया। कड़कड़ाती सर्दियों में जब सारा जनजीवन ठप पड़ जाता ऐसे में ग्राहकी के अभाव में पूरे परिवार को भूखे पेट ही सोना पड़ता।

2014 एशियाड ने कविता और उनके पूरे परिवार की किस्मत पलट दी। गोल्ड मेडल जीतने वाली महिला कबड्डी टीम में होने के चलते सरकार का ध्यान कविता की ओर गया। जहां से पूरे परिवार के दिन पलटने शुरू हुए। जिन माता-पिता ने पूरी जिंदगी एक छोटे से ढाबे में रहकर गुजार दी अब कविता की कबड्डी ने मनाली शहर में पहुंचा दिया। मकान जरूर किराए का है, लेकिन अब जीवन उतना कठिन नहीं रहा।

सस्ता खेल होने की वजह से खेलने लगी कबड्डी

kavita thakur
कविता की इस सफलता से मां कृष्णा ठाकुर भी भावुक हो जाती है। कहतीं हैं, 'ये उसकी मेहनत है। वरना शायद ही हमें कभी सिर के ऊपर पक्की छत नसीब हो पाती। कुछ साल पहले तक तो हम इसके बारे में सोच भी नहीं सकते थे। ढाबे में ही जीते और यही मर जाते। अब देश के लिए वह मेडल लाए, यही उम्मीद है।

कविता ने 2007 में कबड्डी खेलना शुरू किया। स्कूल में लगे इस शौक के बारे में वह बताती है कि यह सबसे सस्ता खेल था इसलिए इसे खेलनी लगी। कविता कहती हैं कि, 'बड़ी बहन कल्पना मुझसे बेहतर कबड्डी खिलाड़ी थी, लेकिन गरीबी और मां-बाप को ढाबे में मदद के चलते उसे अपना सपना मारना पड़ा।'

राष्ट्रीय स्तर पर लगातार बेहतर प्रदर्शन करने के बाद कविता को 2009 में धर्मशाला स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) में जाने का मौका मिला। फिर कविता ने पलट कर पीछे नहीं देखा। अपनी काबिलियत और मेहनत के दम पर पहले नेशनल खेला जल्द ही इंटरनेशनल लेवल पर भारतीय महिला कबड्डी टीम में जगह बनाई।
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जब लगा करियर खत्म

2011 कविता के करियर में बड़ा उलटफेर लेकर आया। तबीयत इतनी खराब हो गई कि डॉक्टर्स ने 6 महीने के लिए बेड रेस्ट की सलाह दे डाली। खुद कविता ठाकुर को भी लगने लगा था कि उनका करियर बर्बाद और वह कभी वापसी नहीं कर पाएंगी। मगर हालातों से लड़ने वाली यह लड़की एक बीमारी से कैसे हार सकती थी।

अगले साल इस 24 वर्षीय खिलाड़ी ने जोरदार वापसी की। 2012 में भारतीय टीम को एशियन कबड्डी चैंपियनशिप में गोल्ड दिलाया। डिफेंडर के रूप में नजर आने वाली इस पहाड़ी लड़की से अब देश को महिला कबड्डी में गोल्ड दिलाने की उम्मीद है।
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