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टाइगर वुड्स को आदर्श मानतीं हैं यह स्टार भारतीय गोल्फर, सुनने में होती है दिक्कत

Sat, 18 Aug 2018 01:41 PM IST
नूतन कुमार गुप्ता, अमर उजाला
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दीक्षा डागर
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लोगों को लगता है कि मैं शारीरिक रूप से अक्षम खिलाड़ियों से प्रतिद्वंद्विता करती हूं, लेकिन ऐसा नहीं है। मैं सामान्य श्रेणी में खेलती हूं और आगामी एशियाई खेलों में भारत के लिए पदक जीतने की पुरजोर कोशिश करूंगी।

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यदि पिता का रुझान खेलों में रहा हो, तो संतान के लिए किसी खेल को करियर के रूप में चुनना ज्यादा मुश्किल नहीं होता। 17 साल पहले मेरा जन्म हरियाणा के झज्जर में हुआ था। मेरे पिता ने सेना में सेवाएं दी हैं। उन्होंने पहले हॉकी खेली और बाद में शौकिया तौर पर गोल्फ भी खेला। गोल्फ के प्रति मेरी दिलचस्पी उन्हीं की प्रेरणा है। उन्हीं की वजह से मुझे एक बेहतर माहौल मिला। शायद यही वजह है कि मैंने 8 साल की उम्र से गोल्फ में हाथ आजमाना शुरू कर दिया था।

लोगों के मजाक ने प्रेरित किया

दीक्षा डागर
मुझे शुरू से ही सुनने में दिक्कत है, लेकिन एक संपन्न परिवार और अच्छे माहौल में मेरी परवरिश होने के नाते मुझे इस बाबत कोई विशेष दिक्कत नहीं हुई। मेरे बड़े भाई को भी मेरी तरह शारीरिक दिक्कत है। वह भी गोल्फ का अच्छा खिलाड़ी है। 

शुरुआती दिनों में मेरा खेल अच्छा नहीं था। कुछ लोगों ने मेरा मजाक भी बनाया। लेकिन उनके इसी व्यवहार ने मुझे अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए प्रेरित किया। पिता के सेना में होने के नाते भी मुझे कई सहूलियतें हासिल हुईं।

जब सिंगापुर में छा गई

दीक्षा डगर
12 साल की उम्र में मैंने अपने करियर का पहला बड़ा टूर्नामेंट खेला। इंडियन गोल्फ यूनियन नेशनल के जूनियर वर्ग में खेलने के बाद एमेच्योर गोल्फ की मेरी दुनिया एकदम से बदल गई। बहुत जल्द ही मुझे देश में अंडर-15 और अंडर-18 स्तर पर शीर्ष खिलाड़ी होने का रुतबा मिल गया। 

14 साल में मैंने अपना पहला अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट श्रीलंका में खेला, लेकिन इस स्तर पर मुझे पहली बड़ी सफलता सिंगापुर में मिली, जब मैं वहां महिला एमेच्योर गोल्फ टूर्नामेंट में विदेशी धरती पर पहली बार जीतने वाली भारतीय टीम की सदस्य थी। जबकि एकल मुकाबले में भी मैं शीर्ष पर रही।

बाएं हाथ से खेलती हूं

दीक्षा डागर
सुनने में दिक्कत होने की वजह से मुझे मशीन का प्रयोग करना पड़ता है। मशीन के कारण खेलने में थोड़ी-बहुत दिक्कत आती है। शुक्र है कि आज के वक्त में बहुत हल्की डिवाइसेस आ गई हैं, जिन्हें प्रयोग करने में ज्यादा दिक्कत नहीं होती। मैं बाएं हाथ की खिलाड़ी हूं, यह भी एक तकनीकी समस्या है। 

बहुत कम गोल्फर बाएं हाथ से खेलते हैं, जिस वजह से उपकरणों की उपलब्धता आसान नहीं है। भारत में तुलनात्मक रूप से इस महंगे खेल के प्रति सरकार की उदासीनता भी किसी एमेच्योर खिलाड़ी के लिए बड़ी समस्या है। ऐसे खिलाड़ियों को पेशेवर खिलाड़ियों की तरह सुविधाएं नहीं मिलती हैं, जबकि ओलंपिक छोड़ यही खिलाड़ी हर जगह देश का नेतृत्व करते हैं।
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आदर्श हैं टाइगर वुड्स

टाइगर वुड्स
करीब तीन साल तक मैं देश की शीर्ष एमेच्योर महिला गोल्फर रही। मैं गोल्फ ही नहीं, बल्कि, टेनिस और स्विमिंग जैसे खेलों में अच्छी-खासी दिलचस्पी रखती हूं। गोल्फ में टाइगर वुड्स और टेनिस में जोकोविच मेरे आदर्श हैं। चित्रकला और पढ़ाई में भी मैं ठीक-ठाक हूं। मुझे कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई बहुत पसंद है। जीव विज्ञान में भी मेरी दिलचस्पी रही है। हालांकि उसकी पढ़ाई मैंने छोड़ दी है। यकीनी तौर पर यदि मैं खेलों में न होती, तो इन्हीं दो क्षेत्रों में आगे बढ़ने का सोचती।

नोट: दीक्षा और उनके पिता नरेंदर डागर से नूतन कुमार गुप्ता की बातचीत पर आधारित।
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