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7 सालों में 700 भारतीयों को मिल चुकी है यह सजा

Fri, 29 Jul 2016 06:23 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली
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राष्ट्रीय डोपिंग निरोधक एजेंसी के रिकॉर्ड्स पर यकीन किया जाए, तो हर साल औसतन 100 भारतीय खिलाड़ियों पर प्रतिबंध की गाज गिरती है। इन खिलाड़ियों में 70% खिलाड़ी एथेलेटिक्स, भारोतलन और कुश्ती के होते है।
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विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को वाडा के नियमों को सख्ती से मानना चाहिए ताकि खेल से डोपिंग के डंक को कम किया जा सके।

हाल ही में देश के दो नामी खिलाड़ी नरसिंह यादव और इंद्रजीत सिंह डोप टेस्ट में फेल हो गए थे और रियो में उनका जाना मुश्किल है। आंकड़ो पर नजर डालें 1 जनवरी 2009 से लेकर अब तक 687 खिलाड़ियो पर डोपिंग के चलते बैन लग चुका है।

नाडा कि रिपोर्ट्स के अनुसार औसतन हर साल 100 खिलाड़ी इसका शिकार होते हैं। 2012 में सबसे ज्यादा खिलाड़ियों पर बैन लगा था। 176 खिलाड़ियों पर बैन के बाद अगले चार सालों में आंकड़ो में गिरावट आई है। इस साल अब तक 72 खिलाड़ियों पर बन लग चुका है।
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क्या है डोप करने का सबसे बड़ा कारण

एथेलेटिक्स (266) और भारोतलन (169) के खिलाड़ी सबसे ज्यादा दोषी पाए जाते हैं। इसमें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी शामिल होते हैं जो स्कूल गेम्स, युनिवर्सिटी लेवल पर डोप करते हैं। इन खेलों के अलावा बॉक्सर, रेसलर, पावरलिफ्टर, तैराक और कबड्डी खिलाड़ियों का नंबर आता है।

इसके अलावा एक सच यह भी है कि ज्यादातर खिलाड़ियों को पता ही नहीं होता कि वो क्या ले रहें। लेकिन आज तकनीक के चलते उनका बचना मुश्किल है। उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि वो ले क्या रहे हैं।

डोपिंग का बड़ा जिम्मेदार लालच भी है। ज्यादातर खेलों में पैसा नहीं है, इसलिए खिलाड़ी मेडल जीत कर पैसा प्राप्त करना चाहते हैं। ओलंपिक मेडल के लिए सरकार मोटी रकम खिलाड़ियों को देती है। इसके अलावा एशियन खेलों में भी जीतने पर अच्छी रकम मिलती है। इसलिए खिलाड़ी डोपिंग का सहारा लेते हैं।

डोपिंग के डंक ने कई खिलाड़ियों को डसा है। इसके दोषी खिलाड़ियों पर आजीवन प्रतिबंध भी लगता है। हालांकि कई खिलाड़ी खुद को बेगुनाह साबित करके प्रतिबंध से बच जाते हैं, मगर अपना करियर नहीं बचा पाते।
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