भारतीय स्टार भारोत्तोलक मीराबाई चानू ने एशियन गेम्स में आखिरकार वह पदक हासिल कर लिया, जिसका इंतजार उनके परिवार और भारतीय वेटलिफ्टिंग ने लंबे समय से किया था। महिलाओं के 49 किग्रा वर्ग में रजत पदक जीतने के बाद जहां पूरा देश उनकी उपलब्धि पर जश्न मना रहा है, वहीं मणिपुर में उनके घर पर खुशी के साथ उस मां की भावनाएं भी सामने आईं, जिसे अपनी बेटी से स्वर्ण की उम्मीद थी।
मीराबाई की मां
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क्या बोलीं मीराबाई चानू की मां?
मीराबाई की मां साइखोम टोम्बी लीमा ने कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि उनकी बेटी इस बार स्वर्ण पदक जीतेगी, लेकिन रजत जीतना भी परिवार के लिए बेहद खुशी और गर्व का पल है। उन्होंने एएनआई से कहा, 'मैं बहुत खुश हूं। मुझे उम्मीद थी और मैंने सोचा था कि वह गोल्ड जीतेगी, लेकिन उसके रजत पदक जीतने से भी हमें बहुत खुशी हुई है। अगर वह स्वर्ण जीतती तो और ज्यादा खुशी होती, लेकिन मुझे उस पर बहुत गर्व है।'
मां ने बताया कि मुकाबले से एक दिन पहले उनकी मीराबाई से लंबी बातचीत हुई थी। चूंकि मुकाबला सुबह जल्दी होना था, इसलिए दोनों की सुबह बात नहीं हो सकी। उन्होंने बेटी को शांत रहने, भगवान को याद करने और पूरी दृढ़ता के साथ अपना सर्वश्रेष्ठ देने की सलाह दी थी। उन्होंने कहा कि उन्होंने मीराबाई से कहा था कि वह अपना ध्यान मुकाबले पर लगाए, प्रार्थना करे और पूरी कोशिश करे। साथ ही उन्होंने भरोसा जताया कि उनकी बेटी भविष्य में गोल्ड मेडल के लिए मेहनत जारी रखेगी।
मीराबाई चानू
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भाई ने भी जताई खुशी, स्वर्ण की उम्मीद थी
मीराबाई के भाई ने भी माना कि परिवार को स्वर्ण की उम्मीद थी, लेकिन रजत भी उनके लिए बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने भारत और मणिपुर के खेल प्रेमियों का धन्यवाद करते हुए कहा कि उनकी बहन स्वर्ण नहीं जीत सकी तो कोई बात नहीं, उसने रजत पदक हासिल किया है और यह भी बहुत बड़ी बात है।
परिवार की यह प्रतिक्रिया मीराबाई की उस लंबी यात्रा को भी दर्शाती है, जिसमें एशियन गेम्स का पदक लगातार अधूरा सपना बना हुआ था। 2018 एशियन गेम्स में चोट के कारण वह हिस्सा नहीं ले सकी थीं, जबकि 2023 के हांगझोउ एशियन गेम्स में जांघ की चोट के कारण क्लीन एंड जर्क में परेशानी हुई और वह चौथे स्थान पर रही थीं।
198 किग्रा वजन उठाकर जीता रजत
नागोया में मीराबाई ने कुल 198 किग्रा वजन उठाकर रजत पदक अपने नाम किया। उन्होंने स्नैच में 83, 85 और 87 किग्रा के तीनों प्रयास सफलतापूर्वक पूरे किए। क्लीन एंड जर्क में उन्होंने 107 किग्रा से शुरुआत की और दूसरे प्रयास में 111 किग्रा वजन उठाया।
उत्तर कोरिया की री सोंग गुम ने गोल्ड मेडल जीता, जबकि इंडोनेशिया की विजायाना लुलुक दियानी त्रि ने ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया। यह मीराबाई का एशियन गेम्स में पहला पदक है। इसके साथ ही उन्होंने अपने प्रमुख अंतरराष्ट्रीय पदकों के संग्रह को भी पूरा कर लिया है। वह इससे पहले टोक्यो ओलंपिक में सिल्वर और कॉमनवेल्थ गेम्स में तीन गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं।
मीराबाई और कोच विजय शर्मा
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कोच विजय शर्मा का भी पूरा हुआ सपना
मीराबाई की इस उपलब्धि से उनके कोच विजय शर्मा भी भावुक नजर आए। उन्होंने कहा कि हर कोच अपने लिए कुछ लक्ष्य तय करता है और एशियन गेम्स का पदक उनकी सूची में लंबे समय से बाकी था। शर्मा ने कहा कि अब जब यह सपना पूरा हो गया है तो वह नए सपने देखने की ओर बढ़ सकते हैं। उन्होंने इस पदक को भारतीय वेटलिफ्टिंग के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण बताया। मीराबाई के रजत ने भारतीय वेटलिफ्टिंग के 28 साल के एशियन गेम्स पदक के इंतजार को भी खत्म किया। इससे पहले कर्णम मल्लेश्वरी ने 1998 के बैंकॉक एशियन गेम्स में 63 किग्रा वर्ग में सिल्वर मेडल जीता था।
मीराबाई और पीटी उषा
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पीटी उषा ने बताया बेहद खास पल
भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष पीटी उषा ने भी मीराबाई को बधाई दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर मीराबाई के साथ तस्वीर साझा करते हुए उनकी दृढ़ता, संघर्ष और खेल के प्रति समर्पण की सराहना की। उषा ने कहा कि मीराबाई का रजत पदक भारत के लिए बेहद खास और गर्व का पल है तथा उनकी यात्रा देश के लाखों युवा खिलाड़ियों को प्रेरित करती रहेगी।
मीराबाई चानू
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सहदेव यादव ने की अर्जुन अवॉर्ड की मांग
भारतीय वेटलिफ्टिंग महासंघ के अध्यक्ष और एशियन गेम्स में भारत के शेफ डी मिशन सहदेव यादव ने भी मीराबाई की उपलब्धि की सराहना की। उन्होंने कहा कि 28 साल बाद भारत को एशियन गेम्स में वेटलिफ्टिंग का पदक मिला है और मीराबाई ने इस बाधा को पार किया है।
यादव ने यह भी कहा कि मीराबाई लंबे समय से अर्जुन अवॉर्ड पाने की इच्छा जताती रही हैं और वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के दौरान इस मुद्दे को उठाएंगे। मीराबाई को पद्म श्री और खेल रत्न मिल चुका है, लेकिन यादव के मुताबिक अर्जुन अवॉर्ड हासिल करना उनका एक सपना है।
मीराबाई चानू
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परिवार के गर्व से देश की उम्मीद तक
मीराबाई के लिए यह रजत सिर्फ एक और पदक नहीं है। परिवार के लिए यह उस बेटी की उपलब्धि है, जिसने चोट, असफलताओं और लंबे इंतजार के बाद एशियन गेम्स के पोडियम पर जगह बनाई। मां को भले ही गोल्ड की उम्मीद थी, लेकिन सिल्वर ने भी परिवार के चेहरे पर गर्व और खुशी ला दी। अब मीराबाई की नजरें आगे की चुनौतियों पर हैं। उनके परिवार को उम्मीद है कि उनकी मेहनत जारी रहेगी और आने वाले बड़े टूर्नामेंटों में वह गोल्ड मेडल जीतकर अपने इस अधूरे सपने को भी पूरा करेंगी।