भारत हॉकी वर्ल्ड लीग फाइनल की मेजबानी कर रहा है। दिल्ली में हो रही इस लीग में भारत सहित दुनिया की टॉप आठ टीमें शिरकत कर रही हैं। भारत हेग (हॉलैंड) में मई में होने वाले वर्ल्ड कप के लिए क्वॉलीफाई कर चुका है।
वर्ल्ड हॉकी लीग में टीम इंडिया की चुनौती कहां तक पहुंचेगी, यह बहुत हद तक कप्तान सेंटर हाफ सरदार सिंह, फॉरवर्ड एसवी सुनील और धर्मवीर सिंह, ड्रैग फ्लिकर वीआर रघुनाथ तथा रुपिंदर पाल सिंह पर निर्भर करेगा। हालांकि भारत को वर्ल्ड लीग में शुरुआत हार से हुई है वह अपने पहले मैच में इंग्लैंड से 2-0 से हार गया।
भारत के लिए इस लीग की अहमियत और उसकी संभावनाओं पर पूर्व बेहतरीन सेंटर फॉरवर्ड, कप्तान और कोच जगबीर सिंह से सत्येन्द्र पाल सिंह की खास बातचीत...
प्रश्नः भारत के लिए हॉकी वर्ल्ड लीग की अहमियत?
उत्तरः भारत के लिए यह टूर्नामेंट दरअसल मई में हेग में होने वाले विश्व कप से पहले दुनिया की टॉप टीमों के साथ खेलने और खुद को आंकने का आखिरी मौका है। टॉप टीमें जिस तरह चैंपियंस ट्रॉफी का इस्तेमाल ओलंपिक की तैयारी के लिए करती रही हैं, उसी तरह यह लीग उन्हें खुद को वर्ल्ड कप की तैयारियों को आंकने का मौका मुहैया कराएगी।
भारतीय टीम इस वर्ल्ड लीग में अपने नए ऑस्ट्रेलियाई चीफ कोच टैरी वॉल्श के मार्गदर्शन में खेलने उतरेगी। टीम के नए उस्ताद वॉल्श को भारतीय टीम की ताकत को आंकने और अपने सभी तीरों को आजमाने का मौका मिलेगा। यह लीग वॉल्श को यह जानने का मौका देगी कि टीम में क्या खामियां हैं?
वॉल्श इन खामियों को दूर कर उसके मुताबिक यह तय करने की स्थिति में होंगे कि वर्ल्ड कप में टीम कहां पहुंच पाएगी। भारत के लिए यह लीग इसमें शिरकत कर रहीं बाकी सात टीमों से ज्यादा अहम है। इसके बाद भारतीय टीम वर्ल्ड कप से पहले संभवत: और किसी टूर्नामेंट में शिरकत नहीं करेगी।
प्रश्नः नए कोच वाल्श के टीम से जुड़ने का क्या असर होगा?
उत्तरः भारतीय खिलाड़ी इस लीग के तुरंत बाद अपनी -अपनी फ्रेंचाइजी टीमों के साथ अपने ही घर में हॉकी इंडिया लीग (एचआईएल) में खेलेंगे। एक लिहाज से भारतीय खिलाड़ियों के पास रिकवरी और विश्व कप के लिए अपने प्रशिक्षण पर ध्यान केन्द्रित करने का मौका रहेगा। भारत का अजलान शाह टूर्नामेंट में भाग लेना अभी तय नहीं नज़र आता।
ऐसे में खासतौर पर इस दौरान खिलाड़ियों को खुद को वाल्श की रणनीति के मुताबिक ढाल कर तैयार करने का मौका मिलेगा। रमणदीप सिंह, आकाशदीप सिंह, दानिश मुज्तबा और गुरविंदर सिंह भी चोट के कारण लीग से बाहर हैं। ऐसे में युवराज वाल्मीकी की वापसी हुई है और अफ्फान युसूफ के रूप में एक नए चेहरे को टीम में जगह मिली है।
इन दोनों के पास टीम में जगह पक्की करने का मौका होगा। इस लीग के बाद खिलाड़ियों को यह मालूम हो जायेगा कि उन्होंने खुद को नए उस्ताद वॉल्श की रणनीति के मुताबिक कितना ढाला है। वॉल्श को भी अपने शागिर्दों की प्रगति को जानने का सही मौका मिल जाएगा।
प्रश्नः टीम सरदार पर ज़रूरत से ज्यादा निर्भर है?
उत्तरः सरदार वाकई विश्व स्तर के खिलाड़ी हैं। वह भारतीय टीम की रीढ़ हैं। आक्रमण और रक्षण की अहम कड़ी। बड़ा सवाल यह है कि यदि प्रतिद्वंद्वी टीम ने सरदार की घेरेबंदी कर दी तो फिर टीम आगे कैसे बढ़ेगी? यह बात भारत की प्रतिद्वंद्वी टीमों को भी मालूम है। हालांकि इस लीग का फॉर्मेट ऐसा है कि इसमें आठ टीमें हैं और हर टीम क्वॉर्टर फाइनल खेलेगी।
भारत की कोशिश यही होनी चाहिए कि वह कम से कम अंतिम चार का सफर तो तय करे। भारत के पूल में शिरकत करने वाली बाकी तीनों टीमें ओलंपिक चैंपियन जर्मनी, इंग्लैंड और न्यूजीलैंड रैंकिंग में उससे ऊपर हैं। ऐसे में भारत को दबाव में आए बिना अपना बेहतरीन देने की कोशिश करनी होगी। भारत के पास वैयक्तिक कौशल की कमी नहीं है।
टीम के पास एसवी सुनील, धर्मवीर सिंह, चिंगलेनसाना सिंह, निकिन थिमैया और मंदीप सिंह जैसे अग्रिम पंक्ति के तेज तर्रार खिलाड़ी हैं। मध्यपंक्ति में खुद कप्तान सरदार सिंह, मनप्रीत सिंह, बीरेंद्र लाकड़ा, कोथाजीत सिंह और गुरमैल सिंह हैं। वीआर रघुनाथ और रुपिंदर पाल सिंह के रूप में दो बेहतरीन ड्रैग फ्लिकर तो हैं लेकिन बड़ा सवाल यह है कि ये दोनों अपने किले की गोलरक्षक पीआर श्रीजेश के साथ मिलकर कितनी मुस्तैदी से हिफाजत कर पाएंगे?
प्रश्नः तो मानें कि भारत के पास विकल्प सीमित हैं?
उत्तरः दिल्ली में जूनियर वर्ल्ड कप में भारत को नाकामी हाथ लगी। मनप्रीत सिंह, मंदीप सिंह और कोथाजीत सिंह अपनी धार दिखाने में नाकाम रहे। ऐसे में इस विश्व लीग में भारत को अपने स्थापित खिलाड़ियों पर ही ज्यादा निर्भर रहना होगा।
जूनियर खिलाड़ियों की नाकामी से भारत के पास विकल्प सीमित ही नजर आते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कामयाबी के लिए वैयक्तिक कौशल से कहीं ज्यादा जरूरी है टीम के रूप में सफलता। हमारे पास सरदार और रघु के रूप में डेढ़ -डेढ़ सौ से ज्यादा मैच और सुनील के रूप में 125 मैच खेल चुके अनुभवी खिलाड़ी हैं।
टीम फिलहाल गोल करने के लिए काउंटर अटैक पर निर्भर है। ऐसे में टीम के सामने गोल करने के लिए उपलब्ध विकल्पों के अधिकतम इस्तेमाल की चुनौती रहेगी।
प्रश्नः टीम के काउंटर अटैक में कितना दम है?
उत्तरः भारत की काउंटर अटैक कर गोल करने की रणनीति तभी कारगर रहेगी, जब खिलाड़ी टीम के रूप में बेहतरीन प्रदर्शन करेंगे। सुनील और धर्मवीर सरीखे खिलाड़ियों के साथ सरदार को गोल करने की जिम्मेदारी उठानी होगी।
ऐसा करने पर ही टीम पेनाल्टी कॉर्नर हासिल कर ड्रैग फ्लिकर के रूप में अपने तुरुप के इक्कों, रघुनाथ और रुपिंदर पाल सिंह का सर्वश्रेष्ठ उपयोग कर पाएगी। इन दोनों को बतौर डिफेंडर पूरी तरह चौकस रहना होगा।