देश में एक बार फिर हॉकी के जादूगर ध्यानचंद को भारत रत्न देने की मुहिम तेज होती जा रही है। पूर्व केंद्रीय खेल मंत्री विजय गोयल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर ध्यानचंद को भारत रत्न देने की सिफारिश की है। प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक अमर उजाला के वेब संस्करण ने भी इस दिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है। अमर उजाला वेब ध्यानचंद पर लगातार खबरें भी प्रकाशित कर रहा है। ध्यानचंद से पहले सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न मिलने पर उसने एक पोल भी चलाया था। जिसमें करीब 25 हजार लोगों ने कहा था कि ध्यानचंद को सचिन तेंदुलकर से पहले भारत रत्न मिलना चाहिए था। अब आगे के पोल में अमर उजाला ने सवाल किया है कि क्या ध्यानचंद को भारत रत्न मिलने से देश में हॉकी फिर से लोकप्रिय हो सकती है। यह पोल अमर उजाला की ध्यानचंद को भारत रत्न दिलाने की मुहिम का एक अहम हिस्सा है। लेकिन हम वर्तमान में हॉकी की स्थिति पर चिंतन करें तो तस्वीर वाकई में सोचनीय है।
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37 साल पहले देश ने हॉकी में 1980 में मास्को ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता था। लेकिन इसके बाद ओलंपिक में हॉकी का प्रदर्शन बेहतर नहीं रहा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हॉकी में देश ने कुछ टूर्नामेंट जरूर जीते हैं लेकिन ओलंपिक में अभी तक हॉकी की स्वर्णिम आभा नहीं लौट सकी है। ध्यानचंद को भारत रत्न देकर सरकार को हॉकी को फिर से लोकप्रिय करने की कोशिश करनी चाहिए। ध्यानचंद को यह सम्मान मिलने से शायद लोग हॉकी से दिल से जुड़ सकें। इसके अलावा और भी चहुंओर प्रयास करने होंगे। इस दिशा में जनता, मीडिया और सरकार को अपने-अपने स्तर में सघन प्रयास करने होंगे। 1983 विश्व कप जीतने के बाद देश में क्रिकेट की लोकप्रियता में लगातार इजाफा हो रहा है। क्रिकेटर पैसे और ग्लैमर की दुनिया में आज अपना डंका बजा रहे हैं। वहीं हॉकी की स्थिति जस की तस है। ध्यानचंद के बेटे अशोक कुमार का मानना है कि हॉकी के नाम पर देश में सबसे पहले एकजुटता लानी होगी। विश्व कप, चैंपियंस ट्राफी और अन्य अहम मैचों से लोगों को जोड़ना होगा। आईपीएल की तर्ज पर शुरू हुई हॉकी लीग में बॉलीवुड साहित अन्य लोकप्रिय लोगों को जोड़ना होगा। 2013 में आईपीएल की तर्ज पर हॉकी इंडिया लीग शुरू हुई तो ऐसा लगा कि हॉकी के दिन बदल जाएंगे। लीग के खिलाड़ियों को 50-50 लाख रुपए मिले। हॉकी में पैसा आ गया, ग्लैमर आ गया लेकिन हॉकी लोकप्रियता हासिल नहीं कर पाई।
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हॉकी से लोगों के दूर होने के पीछे इसका खराब प्रबंधन सबसे अहम कारण है। दरअसर हमारे देश में हॉकी के प्रबंधन पर शीर्ष संस्थाएं और सरकार इसकी लोकप्रियता को लेकर कभी गंभीर नहीं रहीं। एक उदाहरण से आप समझ सकते हैं। मसलन हमारे यहां हॉकी की राष्ट्रीय टीम का कोच भारतीय खेल प्राधिकरण तय करता है। उसे वेतन भी खेल प्राधिकरण देता है लेकिन प्राधिकरण को पता भी नहीं चल पाता है और कोच को हटा दिया जाता है। सरकार ऐसे फेरबदल पर उचित संज्ञान नहीं लेती है। अगर सरकारी निकाय प्राधिकरण को बिना बताए कोच को आपसी मतभेद की वजह से बदला जाता है तो सरकार को इस पर कमेटी बनाकर ऐसे मतभेदों की जांच करनी चाहिए। ताकि हॉकी के स्तर में सुधार हो सके। अफसोस सरकार ने कभी इस ओर गंभीरता से कदम नहीं उठाया।
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ओलंपिक की तैयारी से पहले अक्सर हॉकी एसोसिएशन और कोच में मतभेद की खबरें आती हैं। कोच को लेकर कभी आम सहमति नहीं बन पाती है। विदेशी कोच और स्वदेशी कोच के नाम पर बहस जारी रहती है। हर बार नया कोच बना दिया जाता है। नए कोच के आने के बाद नए ढंग से प्रशिक्षण और उसकी नई शैली के साथ तालमेल बिठाना मुश्किल होता है। पुराने खिलाड़ियों की जगह नए खिलाड़ियों को टीम में जगह नहीं दी जाती है। ऑनलाइन मीडिया के मुताबिक पिछले छह साल में राष्ट्रीय हॉकी टीम के 5 कोच बदले जा चुके हैं। केपीएस गिल 17 वर्ष तक भारतीय हॉकी महासंघ पर महत्वपूर्ण पद पर बैठे रहे और इस दौरान हॉकी टीम में 14 कोच बदले गए। जब 2010 में हॉकी इंडिया सामने आया तो लगा कि दिन बदलेंगे लेकिन कुछ नहीं हुआ।
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देश में बहुत कम लोग ही होंगे जो हॉकी की राष्ट्रीय टीम के पूरे 11 खिलाड़ियों का नाम आपको फटाफट गिना दें। सरकार को हम दोष देते हैं लेकिन खिलाड़ियों से इस तरह से अनजान रहने के लिए तो सीधे तौर पर जनता ही दोषी है। तो सबसे पहले हॉकी को लोकप्रिय करने के लिए जनता को सामने आना होगा। सरकार स्कूल-कॉलेजों में और ब्लाक तथा जिला स्तर पर हॉकी के टूर्नामेंट कराकर लोगों को फिर से हॉकी से जोड़ सकती है। ध्यानचंद को भारत रत्न से सम्मानित करना इस दिशा में और महत्वपूर्ण कदम होगा।
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