गुरजंत के मुताबिक ऐसे कठिन समय में बंदिशों के बीच टीम जिस तरह साथ रही। उससे आपसी जुड़ाव और बढ़ गया। यह जुड़ाव टोक्यो में काम आया है। यही कारण था कि दूसरे मैच में ऑस्ट्रेलिया के हाथों 1-7 की करारी हार के बावजूद टीम विचलित नहीं हुई। गुरजंत खुलासा करते हैं कि इतनी बड़ी हार के बाद किसी भी टीम का आत्मविश्वास डगमगा सकता है, लेकिन हमारी पूरी टीम ने उस हार को मैदान पर छोडने का फैसला कर लिया। कोच ने जरूर मैच की कमियों को दूर कराया, लेकिन किसी ने भी इस मैच के बारे में न बात की और न किसी को जिम्मेदार ठहराया।
गुरजंत यहां तक कहते हैं कि सच्चाई यह है कि ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मिली हार ने टीम को और मजबूत बना दिया। इस हार ने पूरी टीम को धरातल पर ला दिया। सभी को यह समझ में आ गया कि ओलंपिक आसान नहीं है और यहां पदक आसानी से नहीं मिलने वाला है। इस मजबूत मानसिक स्थिति ने ही वापसी का जज्बा पैदा कर टीम की ऐतिहासिक वापसी कराई। सेमीफाइनल में भी बेल्जियम के खिलाफ मिली 2-5 की हार को भी मैदान पर छोड़ दिया गया। टीम को मालूम था कि सेमीफाइनल की हार का मतलब यह नहीं है कि टूर्नामेंट से बाहर हो गए हैं। टीम के पास कांस्य जीतने का मौका था और इसे किसी भी कीमत पर टीम गंवाना नहीं चाहती थी। यही वजह थी कि टीम जर्मनी के खिलाफ 1-3 से पिछडने के बाद 5-3 की बढ़त ले पाई।
गुरजंत को इस बात की खुशी है कि टीम के पदक जीतने के बाद देश में सिर्फ हॉकी की बात हो रही है। आज हॉकी के बारे में देश के 135 करोड़ लोगों में से अनगिनत ने देखा होगा। हॉकी को यही चाहिए।