भारत की टीम की एक और बड़ी ताकत जो अब तक दिखी वह यह है उसकी फिटनेस। मैच में चार क्वार्टर यानी पूरे 60 मिनट में एक ही रफ्तार और जोेश से हमले बोलने का दम रखने के कारण आखिरी क्षणों में बाजी पलटने का दम रखती है।
अतीत में भारत के गजब के वैयक्तिक कौशल वाले जीनियस खिलाड़ी जरूर रहे हैं लेकिन टीम के रूप में वह बहुत कामयाब नही हो पाया। भारत ने इससे सबक लिया है। भारतीय हॉकी को अब 1975 में कुआलालंपुर में हॉकी विश्व कप जीतने के बाद से इसमें फिर पदक जीतने का इंतजार है।
भारत ने अब तक तीन मैचों में 12 गोल किए और महज तीन गोल खाए हैं। भारतीय गोलरक्षक पीआर श्रीजेश के पिता रविंदभनन की तबीयत भले ही अब ठीक है लेकिन जेहनी तौर पर शायद अब भी पिता को लेकर चिंतित है।
श्रीजेश बेशक भारत ही नहीं दुनिया के शीर्ष गोलरक्षकों में से एक हैं लेकिन इस बड़े मैच पर जितना एकाग्र और पूरी तरह फोकस होने की जरूरत है उतने वह नहीं दिख रहे है। अच्छी बात यह है कि टीम प्रबंधन में चीफ कोच हरेन्द्र सिंह का उन पर भरोसा कायम है।
विश्व कप हॉकी में भारतीय टीम के लिए बनारस के ललित उपाध्याय तुरुप का इक्का साबित हो रहे हैं। चौबीस बरस के ललित भारत के लिए 92 मैच खेल चुके हैं।
कनाडा के खिलाफ उन्होंने दो गोल किए। उनका कहना है कि हमारा जोर फिनिशिंग पर है। हम इसी पर बराबर मेहनत कर रहे हैं।’