सरदार सिंह के मार्गदर्शन में भारतीय हॉकी टीम ने खामियों से सबक लेकर बेहतर करना सीख लिया है। टैरी वॉल्श की विवादस्पद विदाई के अध्याय का पटाक्षेप कर भारत अपने ही घर में चैंपियंस ट्रॉफी हॉकी में 32 बरस बाद फिर पदक की आस लगाए है। फिर भी लाख टके का सवाल? क्या सरदार की फौज 1982 में सुरिंदर सिंह सोढ़ी की अगुआई वाली भारतीय टीम की तरह यहां दुनिया की आठ तोप टीमों की जंग में कम से कम कांसा जीत पाएगी? सब विवादों के बावजूद भारत की मौजूदा फॉर्म यह संकेत देती है कि उसमें इस बार पदक जीतने का जोश और माद्दा है।
सभी आठों टीमें क्वार्टर फाइनल में पहुंचेंगी। ऐसे में जर्मनी के खिलाफ शनिवार को पूल बी में कलिंगा स्टेडियम में भारत बिना किसी दबाव के अपनी चिर-परिचित आक्रामक हॉकी खेल लय पा सकता है। यूरोप की सर्दी से आकर यहां के अपेक्षाकृत गर्म मौसम से तालमेल बैठाने में जरूर जर्मनी को कुछ दिक्कत पेश आ सकती है। भारत ने जर्मनी के खिलाफ यदि जीत से अभियान शुरू किया तो वह पदक की आस संजो सकता है। जर्मनी पर इसी साल नई दिल्ली हॉकी वर्ल्ड लीग में अत्यंत रोमांचक मैच में 5-4 से जीत से भी उसके हौसले बुलंद होंगे।