मेजर ध्यानचंद हॉकी जगत का एक ऐसा नाम है जिसने हॉकी को पूरे विश्व में एक अलग पहचान दिलाई। ध्यानचंद की बराबरी फुटबाल के जादूगर पेले और क्रिकेट के सर्वकालिक महान बैट्समैन डॉन ब्रैडमैन से की जाती है। ऐसा माना जाता है कि जब वह हॉकी स्टिक के साथ मैदान में उतरते थे तो गेंद हॉकी स्टिक से चिपक जाती थी। 1928 में जब ओलंपिक विजय के बाद ध्यानचंद टीम सहित लौटे तो मुंबई में उनका भरपूर स्वागत हुआ।
यहां तक मुंबई के डॉकयार्ड में जहाजों का काफिला रुक गया था। जीतकर भारतीय हॉकी टीम बंबई लौटी तब स्वागत में भारी जनता एकजुट हो गई। बंबई के डाकयार्ड पर जहाजों की आवाजाही 24 घंटे नहीं हो पाई थी। इसके बाद ध्यानचंद का तबादला 1928 में नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस वजीरिस्तान (अब पाकिस्तान) में कर दिया गया, जहां हॉकी खेलना मुश्किल था। इस वजह से 1932 ओलंपिक में ध्यानचंद के सेलेक्शन को लेकर भी काफी दिक्कतें आईं।
उनको मैदान में खेल देख ऐसा लगता था कि वे कोई मामूली स्टिक से नहीं बल्कि जादुई स्टिक से खेल रहे हों। जब वह मैदान में खेलने के लिए जाते थे तो उनपर कई बार शक के दायरे में लांछन भी लगाया जा चुका है। दरअसल हॉलैंड में एक मैच के दौरान उनकी हॉकी में चुंबक होने की आशंका की गई, जिसके बाद उनकी स्टिक तोड़कर देखी गई।
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वहीं, जापान में एक मैच के दौरान उनकी स्टिक में गोंद लगे होने की बात भी सामने आई थी। हालांकि ये बात तो सच है कि हॉकी क्षेत्र में जो कीर्तिमान दद्दा मेजर ध्यानचंद ने हासिल किए वो शायद किसी ने अभी तक देश में किसी खेल में हासिल नहीं कर सका। ओलंपिक खेलों में भी भारत की तरफ से दद्दा का जबर्दस्त प्रतिनिधित्व रहा। मेजर ध्यानचंद ने तीन ओलंपिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया, जिसमें दो बार टीम के सदस्य के रूप में जबकि एक बार कप्तान के रूप में और तीनों ओलंपिक में भारत ने जीत हासिल की। दद्दा के नेतृत्व में देश को तीन बार स्वर्ण पदक मिला।
दद्दा वर्ष 1921 में महज 16 साल की उम्र में ही सेना में भर्ती हो गए थे। सेना में लोगों को खेलते देख उनके मन में भी खेलने की ख्वाहिश जगी। सूबेदार बाले तिवारी ने उन्हें खेल की बारीकियां सिखाईं और फिर एक दिन वह देश के बेहतरीन हॉकी खिलाड़ी बन गए।
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अब किसी से नहीं हारेंगे
1926 में जब न्यूजीलैंड को हराकर हॉकी टीम भारत लौटी तो कर्नल जॉर्ज ने मेजर ध्यानचंद से पूछा कि भारत की टीम एक मैच क्यों हार गई तो ध्यानचंद का जबाब होता है कि उन्हें लगा कि उनके पीछे बाकी 10 खिलाड़ी भी हैं। अगला सवाल, तो आगे क्या होगा। जवाब आता है कि अब किसी से हारेंगे नहीं। इस प्रदर्शन और जवाब के बाद ध्यानचंद लांस नायक बना दिए गए।
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