ध्यानचंद 16 साल की अवस्था में 1921 में सेना में भर्ती हुए थे। वह इस दौरान लगातार हॉकी खेलते रहे। उनकी भर्ती के ठीक पांच साल बाद 1926 में सेना ने अपनी हॉकी टीम को न्यूजीलैंड भेजने का मन बनाया। सेना के पहले विदेशी दौरे के लिए खिलाड़ियों की तलाश शुरू हो गई। सेना खिलाड़ियों को खोजने में लग गई। इस बीच ध्यानचंद ने किसी तरह की सिफारिश नहीं लगवाई और ना ही रेजीमेंट के अधिकारियों के चक्कर काटे बल्कि वह लगातार अभ्यास करते रहे।
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स्वाभिमानी ध्यानचंद ने इस दौरान अपने मन को समझाया कि अगर काबिल हूं तो मौका मिल ही जाएगा। फिर एक दिन कमांडिंग ऑफिसर ने उन्हें बुलाया और कहा, 'जवान तुम हॉकी खेलने के लिए न्यूजीलैंड जा रहे हो'। इतना सुनते ही ध्यानचंद बहुत खुश हुए। खुशी इतनी थी कि मुंह से एक शब्द नहीं निकला। आखिर क्यों न हो यह ध्यानचंद का पहला विदेशी दौरा था।
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यादगार रहा यह दौरा
पहले विदेशी दौरे को ध्यानचंद ने यादगार दौरा बनाने के लिए काफी मेहनत की। न्यूजीलैंड में टीम ने कुल 21 मैच खेले 18 में उसे जीत मिली। भारत ने सभी मैचों कुल 192 गोल किए थे। जिनमें से 100 गोल अकेले ध्यानचंद ने किए थे। यह आंकड़ा ध्यानचंद की हॉकी की प्रतिभा को बयां करने के लिए काफी है। ध्यानचंद को इस दौरे के बाद दुनिया में भी लोकप्रियता मिलने लगी।
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