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'पैसे नहीं थे इसलिए फुटबॉल को चुना'

Fri, 08 Jun 2018 08:58 PM IST
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला
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सुनील छेत्री - फोटो : getty
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भारतीय फुटबाल टीम के कप्तान सुनील छेत्री ने कहा, 'मेरी मां नेपाल से हैं और पिता भारत के दार्जिलिंग से, लेकिन मेरा जन्म हैदराबाद के पास सिकंदराबाद शहर में हुआ। भारतीय सेना से संबंधित इलेक्ट्रॉनिक्स ऐंड मैकेनिकल इंजीनियर्स कॉरपोरेशन में नौकरी करने के कारण मेरे पिता को कई शहरों में रहना पड़ा। हमारे परिवार का ठिकाना जम्मू, कोलकाता, लखनऊ, दिल्ली जैसे कई शहरों में बदलता रहा। मेरे पिता खिलाड़ी रहे हैं। उन्होंने सेना के लिए खेला। वहीं मेरी मां और उनकी जुड़वां बहनें भी नेपाल की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम का हिस्सा रही हैं। इस लिहाज से खेलना मेरे लिए कभी नई बात नहीं रहा।'

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बनना चाहता था क्रिकेटर
मैं बचपन में यही चाहता कि बड़ा होकर तेंदुलकर की तरह क्रिकेटर बनूं। मुझे बल्लेबाजी पसंद थी, लेकिन बैट और पैड के खर्च ने मुझे अपनी इच्छाओं को बदलने पर मजबूर कर दिया। दरअसल जब मैंने क्रिकेट कोच से यह कहा कि मुझे बल्लेबाजी सीखनी है, तो उन्होंने अगले दिन पैड और बैट के साथ आने को कहा। मैं बाजार गया और पैड और बैट की कीमत पता की। क्रिकेटर बनने का मेरा सपना वहीं खत्म हो गया, क्योंकि महीने में आठ हजार कमाने वाले अपने पिता से मैं पैड और बैठ के लिए दो हजार रुपये नहीं मांग सकता था।

जब मां ने कुर्सी से बांध दिया
हमारा परिवार बहुत गरीब तो नहीं था, लेकिन हर महीने के अंत तक आर्थिक तंगी आ ही जाती थी। मेरे पास कभी जूते नहीं होते, कभी ट्रायल के लिए जाने के लिए पैसे नहीं होते, तो कभी-कभार अच्छी खुराक के लिए भी मुश्किल होती। मेरे पिता मुझे बस अड्डे तक साइकिल से छोड़ने आते थे और ठीक उतने ही पैसे देते, जितने में बस की टिकट मिलती। मैंने कई दफे बस की टिकट नहीं खरीदी और पैसे बचाए। एक बार घर में पैसे चुराने के कारण मां ने मुझे दो घंटे तक कुर्सी से बांध दिया। दो घंटे बाद वह रोने लगीं और मुझसे माफी मांगी। उस दिन मुझे समझ में आ गया कि मुझे अपनी आदतें बदलनी ही होंगी।
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पहला मैच पाकिस्तान के खिलाफ

सुनील छेत्री
कई टीमों के लिए शौकिया फुटबॉल खेलने के बाद मेरा पेशेवर करियर 2002 में शुरू हुआ। 17 साल की उम्र में मुझे मोहन बागान की ओर से खेलने का मौका मिला। अगले तीन साल तक क्लब के लिए खेलने के बाद 2005 में मुझे चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के खिलाफ अपने पहले अंतरराष्ट्रीय मैच में उतरने का मौका मिला। उसके बाद मैं लगातार भारतीय टीम का हिस्सा बना रहा और पचास अंतरराष्ट्रीय गोल करने वाला पहला भारतीय बना।

जरूर बदलेगी तस्वीर
हाल ही में मैंने अपना सौवां अंतरराष्ट्रीय मैच खेला है। सोशल मीडिया पर दर्शकों से किए गए मेरे अनुरोध के बाद हजारों लोगों ने स्टेडियम पहुंचकर भारतीय फुटबॉल के प्रति अपना प्यार दिखाया। यह अच्छी पहल है, क्योंकि क्रिकेट के दीवाने अपने देश में ऐसे मौके कम ही आते हैं, जब लोग फुटबॉल की चिंता करें। मेरे लिए यह उतना मायने नहीं रखता कि मैं एक्टिव स्कोरर की सूची में सिर्फ महान रोनाल्डो और मेसी से ही पीछे हूं, बल्कि मैं यह चाहता हूं कि देश की अगली पीढ़ी भारतीय फुटबॉल को नए मुकाम पर ले जाए।

-भारतीय फुटबॉल टीम के कप्तान के साक्षात्कारों पर आधारित।
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