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फीफा वर्ल्ड कप: छोटी टीमों का बड़ा कमाल

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फुटबॉल क्रिकेट की तरह अनिश्चय का खेल नहीं है। कहावत भी है, फुटबॉल बाई प्रेशर, क्रिकेट बाई चान्स। फिर ब्राजील में हो रहे फुटबॉल विश्व कप में इतना अनिश्चय, इतना उलटफेर कैसे?
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इंग्लैंड का बाहर होना आश्चर्यजनक नहीं, पर कुल दो मैच में विश्व चैंपियन स्पेन के बाहर होने को क्या कहेंगे? सात-आठ साल पहले उसने फुटबॉल की 'तिकीताका' शैली का ईजाद किया था, जिसमें छोटे पास के अलावा लंबे समय तक गेंद को अपने कब्जे में रखने की रणनीति थी।

इसी के बूते जावी, इनिएस्ता और टोरेस जैसे उसके फुटबॉलर दुनिया पर राज कर रहे थे। पिछले ही साल कन्फेडरेशन कप में ब्राजील ने स्पेन का मानमर्दन कर दिया था, पर उसने इसे गंभीरता से लिया नहीं। दूसरी टीमों ने तिकीताका की काट ढूंढ ली थी।
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स्पेन का जाना एक बड़ा आश्चर्य

स्पेन के थके खिलाड़ियों को बदलना भी जरूरी था; इस विश्व कप में इनिएस्ता को छोड़ टीम का कोई फुटबॉलर फिट नहीं था। पर कोच ने नहीं सुनी।अलबत्ता इस विश्व कप का अब तक का बड़ा आश्चर्य स्पेन की विदाई नहीं है।

उससे भी आश्चर्यजनक दरअसल एक साथ इतने अंडरडॉग टीमों का उभर आना है। हर विश्व कप में कोई सामान्य मानी जाने वाली टीम उभर कर आती है। कभी कोई कैमरून, कभी कोई सेनेगल या कभी कोई अल्जीरिया।

पर अब से पहले किसी विश्व कप में बेल्जियम, कोस्टारिका, घाना, चिली,कोलंबिया और ईरान जैसे अंडरडॉग्स को इतनी सफलता नहीं मिली। न ही ब्राजील, इटली, अर्जेंटीना, पुर्तगाल जैसी तोप टीमें कभी इतनी असहाय और थकी-मांदी नजर आई हैं।

यहां तक कि नीदरलैंड और जर्मनी ने पावर फुटबॉल के जरिये अपने शुरुआती मैचों में जो सनसनी मचाई थी, उसका भी ज्वार थम चुका है।

जर्मनी को घाना ने रोका

पुर्तगाल को चार-शून्य से हराने वाली जर्मन टीम को घाना ने बराबरी पर रोक दिया! हां, नीदरलैंड के आक्रामक फुटबॉल को अभी तक चुनौती नहीं मिली है। बल्कि ब्राजील अपना आखिरी मैच बड़े अंतर से इसीलिए जीतना चाहता है, ताकि दूसरे दौर में उसका सामना नीदरलैंड से न हो।

बड़ी टीमों की तरह ज्यादातर बड़े खिलाड़ी भी अब तक प्रभावहीन रहे हैं। लियोनल मेसी ने जरूर दोनों मैचों में अपनी छाप छोड़ी। पहले मैच में कई खिलाड़ियों को छकाते हुए उनके गोल, और दूसरे मैच में उन्हीं के गोल के बदौलत ईरान पर विजय की ब्राजील में बेहद प्रशंसा हुई है।

पर क्रिस्टियानो रोनाल्डो और वायनो रूनी कुछ नहीं कर पाए, रूनी की टीम तो बाहर भी हो गई। उरुग्वे के सुआरेज और ब्राजील के नेमार ने जरूर अपने क्लास का परिचय दिया है, पर इनके खेल में मेसी जैसी चमक अभी नहीं दिखी।

छोटी टीमों के अच्छा खेलने का कारण क्या है?

दरअसल बेल्जियम, कोस्टारिका, चिली, कोलंबिया और ईरान के खिलाड़ी भी यूरोप के उन्हीं क्लबों से खेलते हैं, जिनमें ब्राजील, अर्जेंटीना, जर्मनी और नीदरलैंड के खिलाड़ी खेलते हैं।

लिहाजा दो टीमों के बीच शारीरिक शक्ति, शैली और कौशल में आज वह फर्क नहीं दिखता, जो कुछ साल पहले तक दिखता था। ‌

आर्थिक उदारीकरण ने फुटबॉल को एक ऐसे विश्व ग्राम में तब्दील कर दिया है, जिसमें इटली का कोई चैंपियन फुटबॉलर घाना या कोस्टारिका की टीम को प्रशिक्षण देता नजर आता है। फुटबॉल में अमेरिका कोई ताकत नहीं है।

लेकिन उसके कोच वह जर्मन बेकनवाउर हैं, जिन्होंने पहले खिलाड़ी के तौर पर, फिर कोच के तौर पर जर्मनी को चैंपियन बनाया। अब उनके दिशा-निर्देश में अमेरिकी टीम अगर जर्मनी की तरह खेलती है, तो यह बिल्कुल स्वाभाविक है।

बेहतर फुटबॉल खेलकर

फुटबॉल में जिन्हें हम छोटी टीम मानते हैं, उन सबने यूरोपीय क्लबों में खेल-खेलकर अपने आपको बड़ी टीमों के बराबर कर लिया है।

छोटी टीमों के साथ एक और सुविधा है-उनके पास ऐसे अनेक युवा फुटबॉलर हैं, जिन्हें खेलने का अवसर कम मिला है, इसलिए वे इस विश्व कप में भरपूर ऊर्जा और संभावना के साथ आए हैं। बेल्जियम के जिन फुटबॉलरों ने अब तक विश्व कप में गोल किया है, वे रिजर्व खिलाड़ी हैं।

यह युवा शक्ति का ही कमाल है क‌ि कोस्टारिका की टीम उरुग्वे और इटली को हरा देती है। बेल्जियम रूस को परास्त कर देता है। ईरान की टीम अर्जेंटीना से हार जरूर गई, पर उसने बेहतर फुटबॉल खेला।
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बड़ी टीमों के ल‌िए खतरा बनीं छोटी टीमें

रक्षण और आक्रमण में वह अर्जेंटीना से बेहतर थी, जो एशियाई फुटबॉल की बढ़ती ताकत भी उदाहरण है। दूसरी ओर, दुनिया भर के तमाम नामचीन खिलाड़ी थकान और चोट के साथ विश्व कप में आए हैं। इसलिए भी यह अंतर पैदा हो रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि दूसरे दौर में बड़ी टीमें और बड़े खिलाड़ी अपना लय पा लेंगे। वे ठीक कह रहे हैं। लेकिन अगर उलटफेरों का यह सिलसिला चलता रहा, तो ब्राजील, जर्मनी, अर्जेंटीना जैसी बड़ी टीमों के लिए खतरा हो सकता है।

ब्राजील के लिए तो खासकर, क्योंकि अपनी जमीन पर विश्व कप होने के कारण उस पर दबाव सबसे ज्यादा है, जबक‌ि उसकी मौजूदा टीम को पिछले दो-तीन दशकों की सबसे खराब टीम बताया जा रहा है।
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