फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

फीफा विश्व कप 2018: दूल्हा नहीं था... बस बाराती थे...!

Fri, 06 Jul 2018 03:27 AM IST
सेंट पीटर्स बर्ग से प्रकाश पुरोहित
विज्ञापन
फैंस
विज्ञापन

इंदौर से परिचित का फोन आया, 'हम लोग मास्को आ गए हैं, आज ही सेंट पीटर्स बर्ग पहुंच रहे हैं। कल के मैच के टिकट की कुछ जुगाड़ हो सकती है क्या!' यह सवाल मेरे लिए बिलकुल नया था तो कुछ ढंग का जवाब नहीं दे पाया। उसी रात मेरे हॉस्टल में दो जर्मन से मुलाकात हुई। 

विज्ञापन


बेचारों ने फायनल तक के टिकट खरीद रखे थे कि उनकी टीम ने धोखा दे दिया। अब ना घर के रहे ना घाट के। इतने टिकट बेकार तो कर नहीं सकते, सो दाम के दाम में बेचने को राजी हो गए। मैंने बड़े उत्साह से इंदौरियों को बताया कि टिकट मिल रहे हैं, चाहो तो मिल सकते हैं, लेकिन इंदौरियों ने शहर घूमने का तय कर लिया था, इसलिए मिलते हुए टिकट लेने से इंकार कर दिया कि वैसे भी कोई दमदार मैच तो है नहीं, जर्मनी का होता तो देख लेते।

सेंट पीटर्स बर्ग स्टेडियम की सारी नीली कुर्सियां लाल और नीली हो जातीं, अगर जर्मनी खेल रहा होता, मगर यहां तो स्वीडन और स्विट्जरलैंड खेल रहे हैं तो किसकी दिलचस्पी हो सकती है देखने में। जर्मन बेचारे भाव के भाव में देने को तैयार और लोग हैं कि कौन जाए देखने। 
विज्ञापन


फिर भी यह आश्चर्य की बात रही कि चौंसठ हजार से ज्यादा हाजिरी लगी स्टेडियम में, कई जर्मन तो मुफ्त में ही टिकट बांट गए... यही वजह रही कि सारी नीली कुर्सियां किसी एक रंग में नजर नहीं आईं। अगर स्वीडन के लोग दस हजार थे तो स्विट्जरलैंड के आधे भी नहीं थे यानी पूरा स्टेडियम पहली बार चितकबरा नजर आया।

माशा अल्लाह, मैच भी ऐसा हुआ कि मेरे पास बैठे तीन पत्रकार तो आधे समय के बाद ऐसे गायब हुए कि फिर लौट कर ही नहीं आए। जो आए, वो जरूर पछताए होंगे कि कहां आकर फंस गए। ये पहला ऐसा मैच था कि सही मायने में जिसका कोई लेवाल नहीं था। उत्साह भी कहीं देखने को नहीं मिला, बस स्वीडन वाले ही पूरे समय खड़े होकर तालियां बजाते रहे। 

ये तालियां ईरान वाले मैच से तो बेहतर थीं, जिसमें वुवुजेला इतना बजा था कि साउथ अफ्रीका का आतंक छ गया था। इस मैच को देखने वाले ज्यादातर ऐसे ही थे, जिन्हें यह बताने का शौक रहा होगा कि हमने भी विश्वकप का मैच देखा है, हासिल तो कुछ भी नहीं हुआ होगा। दर्द तो उन जर्मनों से पूछो, जो किस उम्मीद से आए थे और कहां ये हालत है कि उनके टिकट लेने को इंदौर वाले भी तैयार नहीं हैं... कि बेहतर है शहर ही घूम लें।

विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें