ऑस्ट्रेलिया के तपते-जलते पर्थ की सड़कों पर राहत देने वाली स्वान नदी है, जहां आप दिन भर बैठे रह सकते हैं। इसी नदी के किनारे एक रेस्टोरेंट है ‘अन्न-लक्ष्मी’। एकदम हिंदुस्तानी रेस्टोरेंट। जहां अंदर और बाहर दोनों जगह लोगों का तांता लगा रहता है।
हर देश के लोग लजीज व्यंजनों का लुत्फ उठाने आते है। लेकिन ज्यादा भारतीय मूल के लोग होते हैं या फिर लोकल ऑस्ट्रेलियाई। अगर आप नए हैं और रेस्टोरेंट में बैठकर किसी वेटर का इंतजार कर रहे हों कि वेटर आएगा और मेनू कार्ड देगा, तो यकीन मानिए ऐसा कुछ नहीं होने वाला।
मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, काफी देर इंतजार करने के बाद काउंटर पर खड़े शख्स से पूछा तो बताया गया कि यहां बफे सिस्टम है। खाना आपको खुद ही लेना होगा। जितना चाहे और जो भी चाहे ले सकते हैं।
"जो भी मन हो दे देना नहीं तो कोई बात नहीं"
बफे सिस्टम की बात सुनकर हैरानी नहीं हुई लेकिन उसके बाद बिल के बारे में पूछा तो यकीन मानिए उस शख्स का जवाब सुनकर चौंक उठा। बिल के बारे में उन्होंने कहा कि जो भी मन हो, दे दीजिएगा। नहीं हो तो भी कोई बात नहीं।
जानने की बेचैनी बढ़ गई कि आखिर ये चक्कर क्या है! काउंटरवाले ने एक युवक अरुण कुमार से मिलवाया। कुमार वैसे तो चेन्नई के हैं लेकिन बचपन से ही ऑस्ट्रेलिया में हैं।
उन्होंने बताया कि हमारे गुरुजी स्वामी शान्तानन्द सरस्वती करीब तीस साल पहले यहां किसी के निमंत्रण पर आए थे। उसी दौरान स्वान नदी के किनारे टहलते हुए उन्हें लगा कि ऑस्ट्रेलिया और भारत के बीच कोई पुराना रिश्ता है।
यह बात इसलिए दिमाग में आई कि स्वान का मतलब तो 'हंस' होता है, और हो न हो ये 'हंसा नदी' ही है। सरस्वती का वाहन। तब उन्होंने यहां के भारतीयों से कहा कि अगर भारत यहां ज़िंदा रखना है तो कोई सेवा शुरू करनी चाहिए।
उन्ही के आदेश पर अन्न-लक्ष्मी की शुरुआत 1991 में की गई। सेवा में पर्थ के करीब चालीस परिवार जुड़े हैं, जो न सिर्फ धन लगाते हैं, बल्कि जूठे बर्तन साफ करते हैं। यहां एक भी नौकर नहीं है। रोज करीब छह सौ लोग खाने आते हैं।