हर रोज जिंदगी की जद्दोजहद में जुटे पिता और सिर पर सब्जी लादकर फेरी लगाने वाली बेटी की यह कहानी एकबारगी किसी सपने से कम नहीं लगती।
पांच साल पहले तक पिता के साथ सब्जी बेचने वाली आशा राय का एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में रजत पदक जीतना वर्षों की तपस्या का परिणाम ही तो है।
एक तरफ पिता के काम में हाथ बंटाने का धर्म था तो दूसरी ओर खेलों की दुनिया में नाम रोशन करने का ख्वाब आंखों में पल रहा था। इस द्वंद्व में फंसी आशा ने दोनों जिम्मेदारियों के साथ पूरा न्याय किया।
करीब पांच साल पहले तक की बात है...। सिर पर सब्जी की टोकरी रखकर फेरी लगाना हो या सिंगूर (पश्चिम बंगाल) से 16 किलोमीटर दूर सोराफुली से साइकिल पर सब्जी लादकर लाना, आशा अपने किसी फर्ज से पीछे नहीं हटीं। बेटी से मिले सहारे से खुश पिता उसे एथलेटिक्स में नहीं जाने देना चाहते थे।
मगर अब जबकि उनकी बिटिया ने एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 200 मीटर की दौड़ में रजत पदक जीता तो पिता की आंखों में खुशी के आंसू छलक उठे। अब वह उसे अपने सपने को जीने से रोकना नहीं चाहते।
आशा ने पदक जीतते ही सबसे पहले सिंगूर में रहने वाले अपने कोच प्रबीर चंदा को फोन मिलाया। रजत जीतने की खबर देकर वह रोने लगी। प्रबीर ने थोड़ी देर में फोन करने को कहा। जब वह पदक जीत रही थीं उस वक्त उनके पिता भोलानाथ राय सिंगूर रेलवे स्टेशन के बाहर सब्जी बेच रहे थे।
प्रबीर उनके पास गए और आशा की पिता से बात कराई। रोते हुए उनके मुंह से यही निकला, ‘एक सब्जी बेचने वाले की बेटी एशिया में दूसरे नंबर पर है यह सोचा भी नहीं जा सकता है।’
प्रबीर बताते हैं कि 2007 में नेशनल स्कूल गेम्स में जब आशा ने चार स्वर्ण पदक जीते, तो उसके कुछ साल तक वह पिता के साथ सब्जी बेचने के लिए फेरी लगाती रहीं। नेशनल चैंपियन बनने के बाद उन्हें पिछले वर्ष रेलवे में क्लर्क की नौकरी मिली।