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व्रत में अंडा, मांस मछली खाने की मनाही क्यों, जानिए क्या है विज्ञान

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उपवास के दौरान राजसी-तामसी वस्तुओं के इस्तेमाल से पूरी तरह परहेज बरतने को अनूशासन बताया गया है। अपेक्षा की जाती है कि यह अनुशासन यथासंभव हमेशा बरता जाए। हमेशा नहीं हो सके तो ज्यादा से ज्यादा। इस अनुशासन से सात्विकता का मार्ग खुलता है शुरुआत भोजन से होती है। सवाल है कि कौन सा भोजन सात्विक है, जो उपवास में ग्रहण किया जा सकता है।
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इसका जवाब है- दूध, घी, फल और मेवे। उपवास में ये आहार इसलिए मान्य है कि ये भगवान को अर्पित की जाने वाली वस्तुएं हैं। प्रकृति प्रदत्त यह भोजन शरीर में सात्विकता बढ़ाता है।

भगवद्गीता के अनुसार मांस, अंडे, खट्टे और तले हुए, मसालेदार और बासी या संरक्षित व ठंडे पदार्थ राजसी-तामसी प्रवृतियों को बढ़ावा देते हैं। इसलिए उपवास के दौरान इनका सेवन नहीं किया जाना चाहिए।
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व्रत में सात्व‌िक भोजन क्यों?

उपवास के दौरान किए जाने वाले अनुष्ठानों का भी व्यापक अभिप्राय है। डा केके अग्रवाल के अनुसार असल में इस तरह के अनुष्ठानों से शरीर में पैदा होने वाले विषैले पदार्थों के प्रभाव को समाप्त किया जा सकता है।

शारीरिक शुद्धि के लिए तुलसी जल, अदरक का पानी या फिर अंगूर इस दौरान ग्रहण किया जा सकता है। जबकि मानसिक शुद्धि के लिए जप, ध्यान, सत्संग, दान और धार्मिक सभाओं में भाग लेना चाहिए।

उपवास की प्रक्रिया सिर्फ कम खाने या सात्विक भोजन से ही पूर्ण नहीं हो जाती। इस दौरान सुबह-शाम ध्यान करना भी जरूरी है। इससे मन शांत होता है और अच्छाई के संस्कार बढ़ते हैं।
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