सफलता का पहला नियम यह है कि इसका कोई नियम नहीं है। वेदांत दर्शन के मान्यताओं को प्रयोग और तथ्य की कसौटी पर परखने में लगे संस्थान अद्वैत विजन का मानना है कि सफलता के नियमों के खोज में लगने पर हाथ कुछ नहीं आता। जो पता चलता है, वह अगले ही पल खारिज हो जाता है।
आठ सौ से ज्यादा कामयाब लोगों पर परख गया
दुनिया के आठ सौ से ज्यादा कामयाबी और प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचे लोगों की कार्यपद्धति को जांचने परखने के बाद विजन कुछ महत्वपूर्ण नतीजों पर पर पहुंचा है। उनमे एक यह भी है कि कामयाब होने के बाद कुछ मोटी बातें तो तय की जा सकती है लेकिन उनका अनुकरण नहीं किया जा सकता। कारण की सफलता का रसायन किसी निश्चित फार्मूले के अनुसार नहीं बनता। उसका रहस्य बना ही रहता है।
वेदांत के नेति (यह नहीं है) सिद्धांत को सफलता का रहस्य बताते हुए विजन के निदेशक स्वामी निरंजन तीर्थ का कहना है कि ऐसा कोई भी फार्मूला तय करें, उसके सही साबित होने की संभावना एक लाख रुपयों में एक पैसे के बराबर है।
बाकी निन्यानवे लाख निन्यानवे हजार नौ सौ निन्यानवे प्रतिशत कामयाबी तो उन नियमों (अगर कोई है) के अनुसार ही मिलती है, जिनके बारे में पहले से तय नहीं किया जा सकता। वेदांत में इन्ही नियमों को दैव कहा गया है।
और सफलता का यह नियम मिला
स्वामी निंरजन के अनुसार और अध्ययन के गणित में जिस तरह दो और दो चार होते हैं उस तरह जीवन में नहीं होते। क्योंकि गणित एक रूढ़ हो चुकी कला है, जिसके नियम रोजमर्रा के जीवन की सुविधा के लिए बनाए गए हैं। जरूरत के हिसाब से आज भी बनाए जा रहे हैं और आगे भी बनाए जाते रहेंगे।
पर जीवन और संसार के बारे में कोई नियम नहीं बनाए जा सकते। एक ही नियम है कि सिर्फ प्रयत्न करते रहा जाए। विज्ञान की ही बात करें तो वहां भी ज्ञान के नित नए आयाम उद्घाटित होते जाते हैं। पुरानी धारणाएं खंडित होती और नई स्थापनाएं सामने आती हैं।
उदाहरण के लिए अब तक समझा जा रहा था कि प्रकाश की गति सबसे तेज है। अब परमाणु में ही कुछ अंश इस तरह के मिले हैं जो प्रकाश से भी तेज गति से चलते हैं। क्वांटा के नाम से अभिहित इन अंशों के बारे में तय होना बाकी है कि ये पदार्थ हैं या तंरगे। इस बारे में किसी निश्चय पह पहुंचने के बाद कहते हैं कि विज्ञान की तस्वीर ही बदल जाएगी। इसलिए बेहतर है कि कामयाबी की फिक्र किए बिना काम करते रहा जाए।