बुद्धि एक रोड़ा है और भाव एक साधन सहायक। संसार के संबंध और व्यवहार बुद्धि से नहीं भाव से ही चलते हैं। इसलिए किसी से व्यवहार करते समय बुद्धि की बजाय हृदय को प्रधानता देना चाहिए।
योग निकेतन संस्थान बंगलूरु के संयोजक स्वामी धर्मानंद सरस्वती के अनुसार जिंदगी के अस्सी प्रतिशत गुणा भाग हृदय से होते हैं और ज्यादा से ज्यादा बीस प्रतिशत बुद्धि के जरिए।
करीब आठ सौ साधकों पर किए गए एक अध्ययन के अनुसार ज्ञान के मार्ग पर चलने वाले साधकों की तुलना में भाव भक्ति से शांति और ध्यान की ऊंचाइयों तक पहुंचने वालों की संख्या छह गुना ज्यादा है।
भाव भक्ति को जगाने वाला साधन मुख्यरूप से कीर्तन है। स्वामीजी के अनुसार लोग जाने अनजाने इस साधन को अपनाते हैं। आध्यात्मिक उद्देश्यों के लिए तो अपनाते ही हैं, दुनियादारी में भी इसका उपयोग करते हैं। कैसे?
यह पूछने पर स्वामी जी ने कहा कि दलीलें और तथ्यों को दरकिनार कर अपने भावों और इच्छाओं को गुनगुनाते रहना ही भाव भक्ति का दुनियादार भक्ति का स्वरूप है।
अध्ययन के आधार पर भाव भक्ति के साधन को समझाते हुए स्वामी धर्मानंद का कहना है कि भक्ति के व्यावहारिक स्वरूप कीर्तन में शामिल होते ही लोग अपना आपा या कुछ होने का अभिमान भूल जाते हैं।
वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर, प्राध्यापक, उच्चाधिकारी अथवा भद्र पुरुष या महिला आदि के रूप में व्यक्ति जो कुछ भी है वह उसकी सीमाएं हैं। ये ऊपर से थोपी गई विशेषताएं हैं। ये सीमाएं भाव भक्ति या कीर्तन में पूरी तरह खुलने नहीं देंगी।
जब आप कीर्तन में जाएं, तो अपने अहम, पद की गरिमा, लोगों से दूरी आदि सब कुछ छोड़ दें। अपने को कुछ न मानते हुए कीर्तन के प्रवाह में बहने दें। तब और केवल तब ही आप अपनी कुंठाओं तथा सीमाओं का अतिक्रमण कर पाएंगे।