नेपाल में भूकंप की दहला देने वाली खबरों और तस्वीरों के साथ कुछ चमत्कारों का जिक्र भी हो रहा है। इन चमत्कारी घटनाओं में अभिभूत और स्तब्ध कर देने वाला उल्लेख है नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर का पूरी तरह सुरक्षित बच जाना। भूकंप के भयानक झटकों ने नेपाल के अस्सी प्रतिशत मंदिरों को लगभग नष्ट कर दिया, उन्हीं झटकों ने पशुपतिनाथ पर खरोंच तक नहीं लगाई।
मंदिर का बच जाना चमत्कार या ईश्वर की कृपा है तो बाकी मंदिर क्यों नहीं बचे? उनके पुण्य और तेज में क्या कोई कमी थी? इस बात को कोई नहीं मानेगा। मंदिर बचने की वजह उसकी दिव्य सामर्थ्य बताई गई है, जिस पर कोई तर्क नहीं किया जा सकता।
भूकंप से हुई तबाही 6 अगस्त 1945 को जापान में हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए गए पहले परमाणु बम की तुलना में करीब 504 गुना ज्यादा हैं। उस परमाणु धमाके की ताकत 125 किलो टन टीएनटी उर्जा की थी। लेकिन नेपाल में 7.9 रिक्टर स्केल के भूकंप की ताकत 79 लाख टन टीएनटी के बराबर थी। जापान में परमाणु बम के कारण जो महाविनाश हुआ उसकी आज तक कोई मिसाल नहीं है।
केदारनाथ और पशुपतिनाथ के सुरक्षित रहने का चमत्कार
नेपाल में भी महाविनाश हुआ। कोई इमारत सलामत नहीं बची और करीब आठ हजार लोगों के शव तो अभी तक निकाले जा चुके हैं। मलवे में कितने दबे पड़े होंगे, यह तो कुछ कहा भी नहीं जा सकता। इस लिहाज से 25 अप्रैल को आए उस विनाशकारी भूकंप के बाद पशुपतिनाथ मंदिर का सुरक्षित बचे रहना कई श्रद्धालुओं के हिसाब से चमत्कार हैं।
पशुपतिनाथ मंदिर के बचे रहने की घटना को दो साल पहले उत्तराखंड में हुए जल प्रलय के दौरान सुरक्षित रह जाने वाले केदारनाथ मंदिर से भी जोड़कर देखा जा रहा है। कहते हैं कि दोनों क्षेत्र यानी केदारनाथ और पशुपतिनाथ हिमालय में स्थित, सृष्टि के जन्म के साथ दिव्य प्रकाश के रूप में स्वयं प्रकट हुए। ज्योतिर्लिंग, मृत्यु और विनाश के भय को दूर करने वाले बारह शिवमंदिरों में प्रमुख पुण्य क्षेत्र हैं। कहा जाता है कि खुद भगवान शिव ने जल प्रलय के समय केदारनाथ मंदिर और भूकंप के समय पशुपतिनाथ मंदिर की रक्षा की।
पशुपतिनाथ मंदिर से जुड़ा पूरा इलाका करीब 264 हेक्टेयर में फैला है। यहां छोटे बड़े करीब 518 मंदिर हैं। इनमें लगभग सभी मंदिर ध्वस्त हो गए हैं। लेकिन पशुपतिनाथ मंदिर का कुछ नहीं बिगड़ा। दो साल पहले केदारनाथ मंदिर भी इसी तरह बचा था। आसपास के तमाम देवालय क्षतिग्रस्त हुए पर केदारनाथ का कुछ भी नुकसान नहीं हुआ। सवाल यह है कि कोई दैवीय चमत्कार बचा रहा था क्या?
पशुपतिनाथ का असली चमत्कार मौजूद था मंदिर में
अगर दैवी शक्ति को एक तरफ थोड़ी देर के लिए रखें तो और व्यवहारिकता से सोचें कि दैवी शक्तियां ही रक्षा कर रही थी तो सोमनाथ के ज्योतिर्लिंग को महमूद गजनवी ने 1024 में पूरी तरह क्यों नष्टभ्रष्ट कर दिया। वहां से हीरे जवाहरात और सोने चांदी के आभूषणों को सैकड़ों घोड़ों और ऊंटो पर लादकर क्यो ले जा सका।
हजारों मंदिरो को देशी विदेशी आक्रमणकारियों ने लूटा खसोटा है। यहां सिर्फ ज्योतिर्लिंग की ही बात की जा रही है, जो सृष्टि के साथ ही जन्मे और शिव द्वार रक्षित बताए जाते हैं। सोमनाथ के अलावा काशी विश्वनाथ मंदिर है जो आठवी शताब्दी से बराबर लूटा खसोटा जा रहा है। आखिरी बार उसे 1669 में औरंगजेब ने लूटा और ध्वस्त किया। इसके कोई 110 साल बाद महारानी अहिल्याबाई होलकर ने इसे बना कर खड़ा किया।
ऐसे में पशुपतिनाथ का भयानक आपदा के समय भी सुरक्षित रह जाना और उससे पहले केदारनाथ मंदिर के सुरक्षित बचे रहने की वजह चमत्कार नहीं मंदिर का स्थापत्य और शिल्प माना जा सकता है। पशुपतिनाथ मंदिर पगोडा शैली में बना है। पहाड़ी इलाका होने से भूकंप और प्राकृतिक आपदाएं आने की संभावना यहां बराबर रहती है।
मंदिर बनाए जाते समय निश्चित रूप से जिस शैली को अपनाया गया वह यही सोच कर बनाया गया होगा कि संरचना ऐसी हो जो प्राकृतिक झटकों को सहज ही झेल जाए। इसके लिए जिस शैली को अपनाया गया वह पगोडा शैली है।
पशुपतिनाथ किस तरह बचा जानिए पगोडा शैली का विज्ञान
पगोडा तकनीक की बारीकी भूकंप की प्रक्रिया से समझनी होगी। भूकंप की शुरुआत में धरती के भीतर हलचल शुरु होती है। हलचल कंपन के रूप में सतह पर आ जाती है। धरती पर बनी इमारतें भी इस कंपन से कांपने लगती है। कंपन के कारण जब कोई इमारत इतनी झुक जाती है कि उसका गुरूत्वाकर्षण केन्द्र से हट जाता है तो इमारत गिर जाती है।
पशुपतिनाथ मंदिर बनाते समय जिस तकनीक का इस्तेमाल किया गया, उसमें भूकंप के दौरान धरती और इमारत तो हिलती है पर संतुलन बना रहता है यानी आधार से गुरूत्वाकर्षण बना रहा है इससे इमारत का कुछ नहीं बिगड़ता।
जापान में बने पगोडा शैली के बने घरों और मंदिरों में ध्यान रखा जाता है कि भूकंप के समय वे एक तरफ नहीं झुके, बल्कि हर मंजिल पहले वाली मंजिल से विपरीत दिशा में जाए। मंदिर मजबूत चबूतरे पर बने खंबों पर टिके होते हैं। साथ ही हर मंजिल का खंभा निचली मंजिल के खंभे से अलग जगह बना होता है। इसलिए धरती बाएं जाएगी तो निचली मंजिल दाएं ओर हिलेगी और निचली मंजिल दाएं जाएगी तो पहली मंजिल बाईं ओर।
इमारत का पूरा वजन एक तरफ नहीं जाता और इमारत बच जाती है। पशुपतिनाथ मंदिर के सुरक्षित रहने की एक और वजह है। इस शैली में छतों को दीवारों पर साधे रहने के लिए लकड़ी के खंभे आपस में जोड़े जाते हैं, लेकिन कीलों का इस्तेमाल नहीं होता। बिना कीलों के ही इन्हें इंटरलॉट सिस्टम से इस तरह फिट किया जाता है कि ये आपस में फंसे रहते हैं।
भूकंप से कंपन होने पर ये सिरे आसानी से हिलने लगते हैं लेकिन इमारत में लचीलापन बना रहता है। इस स्थिति में इमारत का हर हिस्सा भूकंप के झटकों को आसानी से झेल जाता है। स्थापत्य का यही चमत्कार है जो मानवीय बुद्धि में परामात्मा ने कौशल और सूझबूझ के रूप में भर दिया है।