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सीता नहीं रावण की मृत्यु का कारण थी अन्य स्त्री

Tue, 14 May 2013 03:41 PM IST
ज्योतिर्मय
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पौराणिक कथाएं दिखती भले ही कल्पनाओं की उड़ान हों लेकिन उनमे जीवन के गहन सत्य छिपे पड़े हैं। उन कथाओं का अर्थ तलाशने या रहस्यों की कुंजियां खोलने में लगे प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान कोल्हापुर के राधिका रमण द्विवेदी का कहना है कि असंगत और अतार्किक लगने वाली पौराणिक कहानियों में एक नहीं कई अर्थ निहित है।
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चार पांच दिन बाद आ रहे सीता नवमी के मौके पर उन्होंने कर्म फल और स्त्रीशक्ति के प्रताप को व्याख्यायित किया है। उनके अनुसार सीता भगवती लक्ष्मी का अवतार है। उनके कारण रावण के आसुरी आतंक का नाश हुआ। वाल्मिकी रामायण के अनुसार सीता की कथा में कर्मफल के इस नियम की ध्वनि भी गूंजती है कि जो जैसा करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है।

कथानक के अनुसार लंका के राजा रावण ने हिमालय का भ्रमण करते एक ऋषि कन्या को देखा। उसका नाम वेदवती था। उसे देखते ही रावण मुग्ध हो गया। वह कन्या के निकट गया और अभी तक उसके अविवाहित रहने का कारण पूछा।
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वेदवती ने बताया कि उसके पिता उसका विवाह विष्णु से करना चाहते थे। परन्तु एक राक्षस के मुझ पर मोहित होने के कारण उसने मेरे पिता का वध कर दिया। पति के वियोग में माता भी मर गई। पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए तपस्या का मार्ग अपनाया।

रावण ने शुरु में कन्या को स्नेह से फुसलाने की कोशिश की, परन्तु उसके नहीं मानने पर उसने वेदवती के केश पकड़ लिए तब उसने  रावण के द्वारा पकडे गये बालों को काट दिया और दौडते हुए अग्नि कुंड मे कूद कर अपनी जान दे दी। वही वेदवती अगले अगले जन्म में एक कन्या के रुप में जन्मी और रावण के विनाश का कारण बनी।

एक स्थापना के अनुसार पूर्वजन्म के सूत्र आसानी से समझ नहीं आते। वे टेढ़े-मेढ़े रास्तों से ही चरितार्थ होते हैं। इस प्रतिपादन का आधार निरूपित करते हुए दूसरी कथा यह कहती है कि अगले जन्म में वेदवती कमल के रुप में जन्मी। ज्योतिषियों के कहे अनुसार इस कमल को समुद्र में फेंक दिया गया। यही कमल जल मार्ग से होता हुआ कन्या रूप में राजा जनक को मिली। वही कन्या जानकी और सीता के नाम से जानी गई।
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