संत-महात्माओं का कथन है कि भगवान भाव के भूखे हैं, इसलिए मानस पूजा का विशेष महत्व है। इस पूजा को करते हुए साधक अपने आराध्य को मुक्ता-मणियों से जड़े सिंहासन पर विराजने का अनुरोध करता है, गंगाजल से स्नान कराता है, कामधेनु के दूध से पंचामृत तैयार करता है।
पृथ्वी रूपी गंध, कुबेर की पुष्प वाटिका से कमल पुष्पों का चयन, भावना से धूप, दीपक तथा अमृत रूपी नैवेद्य अर्पित करता है। मानस पूजा का यह स्वरूप तीनों लोकों की सभी वस्तुएं परमात्मा के चरणों में भावना से अर्पण करता है। इसमें जितना भी समय लगता है, साधक सारा समय भगवान के संपर्क में बिताता है। वह अपने आराध्य के लिए पूजा के साधनों की कल्पना करता हुआ मन को यहां-वहां दौड़ाकर उन्हें मन ही मन
में जुटाता है।
मन को दौड़ाने की इस पद्धति में साधक को पूरी छूट मिल जाती है, जैसे- अपने आराध्य को आसन देना है, वस्त्र और आभूषण पहनाना है, चंदन लगाना है, मालाएं पहनानी हैं, धूप-दीप दिखलाना है और नैवेद्य निवेदित करना है।