योग और ध्यान भारतीय जीवनशैली का अभिन्न अंग रहे हैं। परंतु अंग्रेजी शब्दकोश में यह शब्द जिस मनीषी की देन है उनका नाम है परमहंस योगानंद। यह वही पुस्तक है, जो एप्पल के संस्थापक स्टीव जाॅब्स के कंप्यूटर में मिली थी। पुस्तक उनकी सर्विस में आए लोगों को बांटी गई। 45 भाषाओं में अनुवादित (12 भारतीय और दुनिया की 33 भाषाएं) इस पुस्तक ने विश्व को योग से परिचय कराने और उसे लोकप्रिय बनाने में बड़ा योगदान दिया है। योग को शब्दकोश के रास्ते विश्व मंच पर पहुंचने मे लगभग सदी लग गई।
तीन साल पहले 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मना। अभी केवल योग को मान्यता मिली है, अवरोध और विरोध समय के साथ ही छटेंगे और घटेंगे। मानसिक व्यथाओं का मारा मनुष्य जान ही जाएगा कि योग बिन गुजारा नही। जिस दिन मनुष्य आज की भौतिक सुविधाओं की भांति योग का भी आदी हो जाएगा। सही मायने में तभी योग के विश्व मंच से विश्वव्यापी होने तक की चरम परिणित होगी। योग की अन्य धाराओं ने भी समाज में अपना योगदान दिया है।
यह मात्र एक विद्या नहीं है, व्यायाम या साधना नहीं है। यह एक पूरी संस्कृति है। सदियों से हमारे जीवन का महत्वपूर्ण अंग रही, इस विद्या को अब लोग मानने लगे हैं। अपनाने लगे हैं। अपनाना तो पड़ेगा। योग शक्ति को मानना भी पड़ेगा। बिना इसके स्वस्थ और संस्कारी जीवन जीना संभव ही नहीं है।