पुराणों में महर्षि च्यवन की कथा मिलती है। इस ऋषि की प्रसिद्घि इसलिए है और इनकी चर्चा भी अक्सर इसलिए होती है कि इन्होंने अपनी जीर्ण हो चुकी काया यानी बुढ़ा हो चुका शरीर को फिर से नया यानी जवान कर लिया था।
कथा के अनुसार यह आयुर्वेद के अच्छे जानकार थे और अपनी इसी विद्या से इन्होंने एक रसायन तैयार किया जिसके सेवन से इन्होंने बुढ़ापे को हरा कर भगा दिया और फिर से जवान हो गए।
इनके द्वारा बनाया गया रसायन च्यवनप्राश कहलाया। संभव है कि इनके द्वारा बनाए गए च्यवनप्रश में जो तत्व शामिल थे उनमें से कई तत्वों की जानकारी अब नहीं होने कारण बाजार में उपलब्ध च्यवनप्राश सिर्फ आपके स्वास्थ्य को बेहतर रखने में कारगर होते हैं न कि आपको फिर से जवान कर सकते हैं।
हम यहां च्यवनप्राश की बात करने नहीं आए हैं, बात है कि हम किस तरह हजारों साल तक जीवित रह सकते हैं। च्यवन ऋषि एक उदाहरण मात्र है कि प्राचीन काल में ऐसी तकनीक विकसित हो चुकी थी जब मनुष्य फिर से जवान हो सकता था और हजारों साल जीवित रह सकता था। अब उसी कड़ी को फिर से तलाशने की कोशिश की जा रही है।
शरीर तीन सौ वर्ष तक कायम रह सकता है
शरीर जिन कोशिकाओं (सेल्स) से बना है, वे टूटती और टूटे फूटे सेल्स की जगह नए कोशों में तब्दील होती रहती हैं। जैसे सर्प की त्वचा चार से छह सप्ताह में झिल्ली (केंचुल) के रूप में अलग हो जाते हैं, मनुष्य की त्वचा के कोश भी पांच दिन में बदल जाते हैं। अस्सी दिन में तो प्रोटीन पूरी तरह बदल कर नई हो जाती है। पुरानी का कहीं पता नहीं चलता।
सेन गियागो की संस्था शार्प कम्युनिटि मेडिकल ग्रुप के प्रो.केनिथ रोसले का कहना है कि मनुष्य के कोशों (सेल्स) को निरंतर सक्रिय और स्वस्थ रखना संभव हो तब उसका शरीर तीन सौ वर्ष तक कायम रह सकता है। अगर कोई गड़बड़ी न आए तो गुर्दे 200 वर्ष, हृदय 300 वर्ष तक रखे जा सकते हैं। इसके बाद उन्हें बदला भी जा सकता है।
हृदय प्रतिरोपण के प्रयोग तो बहुत बेहद सफल हुए हैं। इसके अतिरिक्त चमड़ी, फेफड़े और हड्डियों को क्रमशः एक डेढ़ और चार हजार वर्ष तक दुरुस्त मजबूत रखा जा सकता है। इन्हे बदलना आसान हुआ और और कोशाओं के बारे में प्रयोग कामयाब हुए तो वह दिन दूर नहीं जब वृद्ध व्यक्ति को ज्यादा से ज्यादा बारह सप्ताह में बदल कर नया किया जा सकेगा।
आपके दुर्घायु होने में बस यह दिक्कत है
खास दिक्कत ‘नाड़ी-कोशिकाओं’ के साथ हैं। और कोश तो बदल जाते हैं, पर वे कोश जो नाड़ियां बनाते हैं,न बदलते हैं और न ही पुराने से नए होते हैं। सामान्य कोशों से अलग इन कोशों की आकृति बड़ी विचित्र होती हैं। एक वर्ग सेंटीमीटर जगह में अठाइस लाख तक समा जाने वाले इन कोशों का मुंह मोटा और पूंछ सांप की तरह पतली होती चली जाती है।
स्विटजरलैंड के जूरिच राज्य के इसी नाम के शहर स्थित महर्षि वैदिक रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रो. यजनानन देऊ का कहना है कि आज का उपलब्ध शरीर रचना विज्ञान (एनाटॉमी) योगशालाओं में वर्णित रचनाओं से काफी कुछ मिलता-जुलता है। योगशास्त्रों में इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना, बज्रा, चित्रणी, ब्रह्मनाड़ी, अलम्बुसा, कुहू, गान्धारी जैसी सूक्ष्म 72 हजार नाड़ियों का विवरण मिलता है। एनॉटामी में भी शरीर के भीतर ऐसी ही जानकारियां हाथ लगी है।
न्यूयार्क यूनीवर्सिटी के डॉ. मिलन कोपेक ने जानने की कोशिश की हैं कि कोश की मूलभूत रचना के तत्वों और क्रम का पता लगाया जाए। जिस दिन वह पता चल गया तो कोशों का शुद्धीकरण और रोगों से बचना तथा कोषों का आमूल-चूल परिवर्तन कर दीर्घायुष्य प्राप्त करना बहुत आसान हो जायेगा।
अल्ट्रावॉयलेट किरणों आदि के प्रयोगकर्ता शिकागो विश्वविद्यालय के डॉ. रेमण्ड जर्किल तथा डॉ. राबर्ट उरेज ने उस सिद्धान्त की भी पुष्टि कर दी है कि प्रकाश-शक्तियों के अवतरण द्वारा भी शरीर को नितान्त शुद्ध और रोगमुक्त बनाया जा सकता है।