कृष्ण की लीलाभूमि
वृन्दावन श्रद्धालुओं को ज्यादा लुभाती है। सैंकड़ो मन्दिर, जिनमें से अनेक
ऐतिहासिक धरोहर भी है। मंदिरों से ज्यादा आश्रम और कई गौशालाएं तथा गौड़ीय वैष्णव,
वैष्णव और धार्मिक क्रिया-कलापों के लिए यह तीर्थ कृष्ण की जन्मस्थली मथुरा से भी
ज्यादा प्रसिद्ध है।
कहते हैं कि भक्तों द्बारा की गयी गऊ पूजा आराधना के
कारण यहां कृष्ण भक्ति की ऐसी तरंगें उत्पन्न हुई कि स्थान तरंगित हो उठा। रूस से
आए योग विज्ञान के विद्वानों की एक टीम ने बताया कि इस तरह की तंरगें पांच सात सौ
सालों में उत्पन्न हुई है वरना तो यह इलाका ऊसर पड़ा हुआ था।
टीम हरिद्बार
में हुए एक अतर्राष्ट्रीय योग सम्मेलन में आई थी। सम्मेलन के बाद सदस्यों ने ब्रज
क्षेत्र की यात्रा भी की थी। टीम के नेता नेवलोकाव ने कहा कि तरंगे उस क्षेत्र में
सकारात्मक भाव से यात्रा करने पर महसूस की जा सकती है। कृष्ण की यह लीला भूमि उनके
बाद लुप्त ही हो गयी थी। याद ही नहीं था या याद भी था तो यह बात प्रेरित नहीं करती
थी कि मथुरा में जन्म लेने के बाद कृष्ण का लंबा समय इस क्षेत्र बीता
है।
सदियों तक विस्मृत रहने के बाद 1590 के आसपास चैतन्य महाप्रभु ने इस
क्षेत्र को उजागर किया। उन्होंने कृष्ण से संबंधित वनों, कुंजों और यमुना के तटों
को खोज निकाला। वृन्दावन और उसके आसपास के सैंकडो तीर्थों की पह्चान और प्रतिष्ठा
उन्ही की देन है। चैतन्य महाप्रभु ने अपनी ब्रजयात्रा के समय वृन्दावन तथा कृष्ण
कथा से संबंधित अन्य स्थानों को अपने अंतर्ज्ञान द्वारा पहचाना था।
रासस्थली, वंशीवट से युक्त वृन्दावन सघन वनों में लुप्त हो गया था। कहते है
कि असली या प्राचीन वृन्दावन कहीं और था। तीर्थों के रहस्य और व्यवस्था के जानकार
लोगों का मानना है कि उनकी स्थापना और प्राण प्रतिष्ठा जितनी कठिन है, उससे भी
ज्यादा चुनौतीपूर्ण है उसे जीवंत और प्रभावपूर्ण बनाए रखना।
रुस से आई योग
विशेषज्ञों की टीम के प्रमुख नेवलोकाव के मुताबिक तीर्थ को जीवंत बनाए रखने के लिए
वहां के कम से कम बीस प्रतिशत लोगों का तीर्थ की आत्मा के अनुरूप होना जरूरी
है।