फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कंजूस आदमी के अंदर इस तरह की परेशानी आती है

Thu, 01 May 2014 03:25 PM IST
ज्योतिर्मय/अमर उजाला, दिल्ली
विज्ञापन
विज्ञापन
दान दे कर किसी पर उपकार या अनुग्रह नहीं करते। परंपरा और शास्त्र तो कहते हैं कि जो दान लेता है, वह देने वाले पर अनुग्रहीत होता है। दान लेने वाला भले ही कातर, याचक और भिक्षु की तरह वर्ताव कर रहा हो पर ऋषि गौतम के अनुसार असल लाभ तो दान देने वाले को ही मिलता है।
विज्ञापन


किस तरह ? एक तो उसके व्यक्तित्व में धन संपदा के मोह का जो अनाश्यक बोझ जमा रहता है, वह छूटने लगता है और जिंदगी पहले से ज्यादा हल्की फुलकी हो जाती है। किसी को बिना कुछ लिए ही देने के बाद चित्त में प्रफुल्लता आती है। इस प्रफुल्लता का अनुभव कोई भी कर सकता है।

पढ़ें,मरने से कुछ समय पहले और बाद का यह वैज्ञानिक रहस्य चौंका देगा
निमाड़ अंचल के किसान भगीरथ मालवीय का अनुभव उद्धृत करने लायक है। उन्होंने नियम बनाया और उसका पालन कर रहे हैं कि खेत में फसल की पहली खेप का आधा हिस्सा लोगों को बांटने में खर्च करेंगे। करीब तीस साल पहले शुरुआत की थी।
विज्ञापन


उन्होंने पहले दिन आई फसल को दो भागों में बांटा और आधा हिस्सा खेत में काम कर रहे मजदूरों को बांट दिया। अगले दिन से पूरी फसल मंडी भिजवाने का सिलसिला बनाया। करीब छह सप्ताह यह क्रम जारी रहा। भगीरथ बताते हैं कि उस पूरे सीजन में किसी भी दिन पहले दिन की फसल के आधे हिस्से से ज्यादा नहीं हुई। उनका कहना था कि हमारा हिस्सा हमें बाकी के इकतालीस दिन भी पहले दिन के बराबर ही मिलता रहा।

पढ़ें,मई महीने का राशिफल, जाने कैसा रहेगा यह महीना

यह बात दानी स्वभाव के कई लोगों के अनुभव में है कि देने से कुछ घटता नहीं है। उससे अपनी आत्मीयता का ही विस्तार होता है। दानी से विपरीत कृपण स्वभाव के व्यक्तियों की जिंदगी में अजीब दैन्य और दारुण भाव रहता है। उदारता जबकि स्वभाव में खुलापन और संतुष्टि लाती है।

गौतम धर्मसूत्र में विभिन्न प्रकार के दानों का जिक्र करते हुए ऋषि मे दान का सूक्ष्म अर्थ यह कहते हुए बताया है कि वह वस्तु पर अपना अधिकार समाप्त करके दूसरे का अधिकार स्थापित करना है।

पढ़ें, अक्षय तृतीया पर करें राशि के अनुसार धन प्राप्ति के उपाय

यह शर्त अनिवार्य् रूप से जुड़ी है कि दान की गई वस्तु के बदले कुछ न लिया जाए। मान लिया जाए कि कोई वस्तु दान में दी गई किंतु उस वस्तु पर पानेवाले का अधिकार होने से पूर्व ही यदि वह वस्तु नष्ट हो गई तो वह दान नहीं कहा जा सकता।

दान की इन्ही बारीकियों को समझने के लिए तिरुअंनतपुरम के वैदिक विद्वान आचार्य रामकीर्ति के मार्गदर्शन में विविध ध्यानों का अध्ययन कर रहे हैं। उनके अनुसार अंतिम समय में और अलग अलग कठिनाइयों के समय दिए जाने, सकल्प करने या कराने अथवा हाथ से छुआ कर किए जाने वाले दानों का भी विज्ञान है। उनके आध्यात्मिक लाभ तो हैं ही, लौकिक कष्ट कठिनाइयों के निराकरण के उपाय भी है।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें