कहने को तो हम कंप्यूटर युग मे जी रहें हैं। इसे मोबाइल या इंटरनेट का युग भी कह सकते हैं। लेकिन विज्ञान को अध्यात्म से जोड़ कर देखने वाले इस जमाने को सूक्ष्म जगत की यात्रा का युग कहते हैं।
ऐसा युग जिसमें बाहर की चकाचौंध कामयाबियों से ज्यादा अपने भीतर की यात्रा और वहां के चमत्कारों को देख दांतो तले अंगुली दबा लेने का युग कहते हैं। अंतर्जगत के रहस्यों को गहराइयों से उजागर कर रहे सेलुलर जीव विज्ञानी ब्रूस लिप्टन के अनुसार यह दौर ‘आनुवंशिकी’ का है।
सन् 1953 में ‘डी.एन.ए.’ की खोज के बाद साबित होता जा रहा है कि हमारी ज्यादातर या दस में से नौ बीमारियों की वजह तनाव है। शरीर अपने आपमें इतनी सक्षम संरचना है कि तमाम रोग बीमारियों से निपट ले। लेकिन तनाव के कारण उसकी रोगों से लड़ने की शक्ति क्षीण हो जाती है।
ब्रूस ली का कहना है कि तनाव किन्हीं बाहरी कारणों से नहीं बल्कि आनुवंशिक कारणों से या माता पिता और परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा उपलब्ध कराए माहौल से पैदा होता है।
आध्यात्मिक पदों का विज्ञान की स्थापना करने के लिए मशहूर असम में कामाख्या के तंत्र विज्ञानी पं.गोविंद शास्त्री का कहना है कि मजबूरी और तनाव का खास कारण माता-पिता से मिले आनुवंशिकी तत्वों पर निर्भऱ है। इस प्रभाव को पहले प्रारब्ध कहते थे, उसे ‘जीन’ में लिखी अचीन्ही संभावना कह सकते हैं।