रोगाणुओं को बेअसर और नष्ट करने के लिए नित नई दवाओं की खोज जारी है। उनकी ईजाद के कुछ समय बाद तक तो असर होता है। पर रोग का एक चक्र पूरा होने के बाद कुछ ही समय में रोगाणु इन दवाओं की प्रतिरोधी-क्षमता विकसित कर लेते हैं।
फिर दवाएं बेअसर होने लगती हैं। फिर ज्यादा असरदार दवाएं तैयार की जाती हैं, फिर रोगाणु और ज्यादा प्रतिरोध क्षमता अर्जित कर लेते हैं और नई दवाओं को भी बेअसर कर देते हैं। उदाहरण के लिए सल्फा औषधियों से शुरू में कई तरह के जीवाणु मरते देखे गये।
पेनिसिलिन के कारण आंत्रशोथ, न्यूमोनिया, टाइफाइड, रक्तदोष और हृदयरोग आदि बीमारियां काबू आने लगी, पर कुछ ही साल बीते होंगे कि दवाएं बेअसर होने लगीं और पिछली बीमारियों के साथ नई और बीमारियां बढ़ने लगीं।
छोटी बीमारियों की जगह ले रही हैं बड़ी बीमारियां
हापकिंस इसंटीट्यूट के प्रो.जूलबर्न ने नई नई बीमारियों के सामने आने का कारण एंटीबायोटिक दवाओं को ही खासतौरपर जिम्मेदार बताया है।
यह ठीक है कि टीका अभियान ने बच्चों को कई रोगों से बचाया। पर जूलबर्न और उन जैसे चिकित्सा विज्ञानियों के अऩुसार एलर्जी की नई समस्या पैदा हो गई। डिपथीरिया, कुकरखांसी, अधरंग, टेट्नस, चेचक, प्लेग आदि अनेक संक्रामक रोगों में कमी आई है।
लेकिन श्वास तथा अन्तरीय संक्रमणों के रोगियों की संख्या पिछले दिनों तेजी से बढ़ी है। 2008 में इकट्ठे किए आंकड़ों के अनुसार डायबिटिज, हृदयरोग, ब्लड प्रेशर, डिप्रेशन नब्बे के दशक में मलेरिया और टाइफाइड जैसी बीमारियों की जगह आ कर बैठ गए हैं।
उसी का नतीजा है यह नई नई बीमारियां
इक्कीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में थायराइड और कैंसर को मरीजों की संख्या चार प्रतिशत के हिसाब से विस्फोटक होने लगी। इन्फ्लुएंजा, संक्रामक हैपेटाइटिस आदि बीमारियां खत्म हो कर फिर बढ़ने लगी।
“आस्ट्रेलियन साइंस न्यूज़लेटर नामक पत्रिका की ओर से दिसंबर 2014 में आयोजित एक कांफ्रेंस में डा. बी. रदरफोर्ड ने थायराइड और कैंसर को सभ्यता का रोग बताया है।
इन्फ्लुएंजा, संक्रामक हैपेटाइटिस और नए नए बुखारों को विज्ञान का कोप बताया है। उनके अनुसार मनुष्य ने विज्ञान को मनुष्य की सेवा में नियुक्त कर प्रकृति का दोहन शुरु कर दिया। उसी का नतीजा नई नई बीमारियों के रूप में सामने आ रहा है।