भूख के कारण एकबारगी तो शरीर का बोध गहराता जाता है। उपवास का समय जैसे-जैसे लंबा खिंचता है, यह बोध धीरे-धीरे इतना गहन हो जाता है कि शरीर के सिवा अपना कोई अस्तित्व ही पता नहीं लगता। लगता है कि अस्तित्व शरीर तक ही सिमट गया है। और वह अब गया तब गया। लेकिन धीरज रखा जाए तो इसके बाद एक अवस्था ऐसी आती है कि अपना अस्तित्व ऊर्जा और स्वास्थ्य से भरपूर होता दिखाई देने लगता है।
उपवास के विज्ञान का खुलासा करते हुए बीके आयंगर योग संस्थान के डा. नील रत्नम ने कहा है कि उपवास के साथ प्रार्थना का समन्वय भी शामिल हो जाए तो सोने पर सुहागा हो जाता है। प्रकृति की वह शक्तियां भी अनुकूल हो जाती हैं, जिनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता। प्रार्थना और भाव भरे हृदय से किया गया उपवास रोग बीमारी के समय खाली पेट रखने की तुलना में करीब सत्तर गुना स्फूर्ति ला देते हैं।
निराहार रहने पर जैसी कमजोरी महसूस होती है, प्रार्थना के साथ किए गए उपवास में शुरुआती कमजोरी तो महसूस ही नहीं होती, आगे चल कर अंदर की बुराई और गंदगी भी साफ हो जाती है। धर्म व्यवस्था और आचार विचार के नियामकों ने उपवास की व्यवस्था की और दावा किया कि इससे मन पवित्र होता है और आत्मशक्ति बढ़ती है तो यह दावा सही ही है।
इन दिनों रमजान के महीने में रोजे रखे जा रहे हैं, सावन शुरु होने पर कई लोग पूरे तीस दिन एकाशम व्रत रखते हैं, जैन पंरपरा में पर्युषण व्रत शुरु होने वाला है फिर नवररात्र व्रत। आयंगर योग संस्थान ने इन दिनों उपवास के आध्यात्मिक प्रभाव जांचने की योजना बनाई है। उसके परिणाम उपवास की दिशा में रोशनी उत्पन्न करेंगे।