संसार के सभी धर्मों में उपवास की मान्यता है। ऐसी धारणा है कि उपवास करने से पापों का नाश, पुण्य का उदय, शरीर और मन की शुद्धि, शांति और कामनाओं की सिद्धि होती है। उपवास के लिए सभी धर्मों में कुछ नियम बनाये गये हैं, उपवास रखने वालों को इस नियम का पालन करना होता है।
व्रत का सामान्य नियम होता है कि इस दौरान मदिरा, मांस आदि ग्रहण करना एवं सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सोना नहीं चाहिए है। उपवास के दौरान सत्य और मधुर वाणी तथा संपर्क में आने वालो के प्रति सद्भाव रखना रखना आवश्यक है।
वास्तव में व्रातोपवास का संबंध अंदर की शुद्घि और स्वास्थ्य से है। आपने देखा भी होगा कि बीमार होने पर चिकित्सक खान पान की सावधानी और परहेज पर जोर देते हैं। व्रतोपवास के दिनों के अलावा सामान्य दिनों में भी यह सावधानी बरती जाय तो बीमार पड़ने की नौबत ही न आए।
परहेज और नियम पालन का ध्यान रखें तो कभी कोई रोग हो भी जाए तो दूसरे लोगों की तुलना में जल्दी आराम मिलेगा। योग इंस्टीट्यूट बंगलूरू के डाक्टर पीवी कुरियन का कहना है कि आहार-विहार में परहेज व्यक्ति को ज्यादा ग्रहणशील और सकारात्मक बनाता है।
हलांकि आम धारणा है कि, उपवास से आत्मशक्ति या विनम्र भाव से कहे तो ईश्वरीय अनुगृह प्राप्त है, उपवास इसी रूप में लोकप्रिय भी है। व्रत धर्म का साधन माना गया है। व्रत उपवास में निराहार या अल्पाहार पर जोर रहता है। वैदिक काल की अपेक्षा पौराणिक युग में अधिक व्रत देखने में आते हैं। उस काल में व्रत के अनेक प्रकार हो जाते हैं।
व्रत के समय व्यवहार में लाए जानेवाले नियमों की कठोरता भी कम हो जाती है तथा नियमों में अनेक प्रकार के विकल्प भी देखने में आते हैं। उदाहरण रूप में जहां एकादशी के दिन उपवास करने का विधान है, वहीं जो लोग उपवास नहीं कर सकते हैं उनके लिए विकल्प में फलाहार और वह भी संभव नहीं हो तो, फिर एक बार विशेष खाद्य पदार्थों जैसे, लहसुन, प्याज, चावल आदि को छोड़कर अन्य आहार करने तक का विधान है।