झुककर या हाथ मिलाकर अथवा गले
लगकर किसी का अभिवादन करने से आपसी संबंध तो प्रगाढ़ हो सकते हैं। व्यक्ति के सभ्य
सुसंस्कृत होने की छवि भी बनती है लेकिन झुककर अभिवादन करने का अलग ही महत्व है।
जर्मन मूल की कृष्णभक्त साध्वी के मुताबिक भी हैलो हाय कहने से आधुनिक होने का
कितना ही गर्व महसूस होता हो लेकिन प्रणाम में जैसी आश्वस्तता प्रतीत होती है, वह
अद्भुत अलौकिक है।
लगता है कि भीतर ऊर्जा का उफान उठ रहा है, जो भाव, बोध और
मस्तिष्क में रहने वाले बुद्धि का अतिक्रमण करते हुए ऊपर ही ऊपर फैलता जा रहा है।
प्रभुपाद भक्तिवेदांत से सीधे हरेकृष्ण मंत्र की दीक्षा प्राप्त साध्वी का कहना है
कि सामान्य प्रणाम अपनी तुलना में बेहतर स्थिति वालों के प्रति किया जाना चाहिए।
किसी को नमस्कार करते हुए हम घोषणा करते हैं कि सभी के हृदय में एक ही दैवीय चेतना
और प्रकाश है जो अनाहत चक्र (हृदय चक्र) में स्थित है।
बंगलूर में योग पर
काम कर रही संस्था ब्रह्मविद्या फाउंडेशन के स्वामी वीके कृष्णन का कहना है कि
प्रणाम के लिए जब हम गुरुजनों के चरणों में झुकते हैं तो उनकी प्राण ऊर्जा से जुड़
जाते हैं और वह ऊर्जा प्रणाम करने वाले की चेतना को भी ऊपर उठाती है। अगर निम्न
स्तर के लोगों को प्रणाम किया जाए तो उससे हानि की संभावना ही ज्यादा रहती है।
क्योंकि उस स्थिति में प्राण प्रवाह उलटी दिशा में बहने लगता है।
योग आचार्य
केशव देव के अनुसार नमस्ते करने के लिए, दोनो हाथों को अनाहत चक पर रखा जाता है,
आँखें बंद की जाती हैं, और सिर को झुकाया जाता है। इस विधि का विस्तार करते हुए
हाथों को स्वाधिष्ठान चक्र (भौहों के बीच का चक्र) पर रखकर सिर झुकाकर और हाथों को
हृदय के पास लाकर भी नमस्ते किया जा सकता है।
यह विधि गहरे आदर का सूचक है।
जरूरी नहीं कि नमस्ते, नमस्कार या प्रणाम करते हुए ये शब्द बोले भी जाएं। नमस्कार
या प्रणाम की भावमुद्रा का अर्थ ही उस भाव की अभिव्यक्ति है।