रास्ते में निश्चित रूप से फूल, फल, झील, झरने और वन उपवन के सुहाने दृश्य आएंगे। पर उनमें रम मत जाना। निरंतर आगे ही बढ़ते रहना, इससे तुम उस स्रोत तक पहुंच सकोगे जहां से ये स्थितियां और उपलब्धियां निकल कर आती हैं। योगी निसर्गदत्त महाराज ने यह बात उपनिषदों और वेदांत के दूसरे ग्रंथों के आधार पर कही थी।
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पिछली शताब्दी में जब ये बात कह रहे थे तो इसे साबित करने का कोई उपाय नहीं था। लेकिन कोयंबटूर के थियोसोफिकल सेंटर के संयोजक बी नागराजन ने साबित कर चौंका दिया है कि योग साधना जैसे जैसे आगे बढ़ती है, दुनिया के रंग बदलते जाते हैं। उनका कहना है कि योग के पहले चरण में जब साधक बैठना शुरु करता है और ठीक से बैठने लगता है, तभी से इस तरह के अनुभव होने लगते हैं।
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अपने गुरु की बताई ध्यान विधि का अभ्यास कर रहे साधकों के अनुभव बटोर कर नागराजन ने कहा है कि निसर्गदत्त महाराज की बताई ध्यान विधि उपनिषदों और योग शास्त्रों से कोई अलग नहीं है। उसमे एकाग्रता साधने पर कुछ अतिरिक्त प्रयास बताए गए हैं।
इन प्रयासों के साथ या इनके बिना भी जिन लोगों ने ध्यान में गति पकड़ी उन्होंने आसन सधते ही, यानी ठीक से बैठने लगते ही कोहरा, धुंआ, सूर्य, वायु, अग्नि के साथ जुगनू या बिजली की चमक अथवा चंद्रमा के शीतल प्रकाश जैसे दृश्य दिखाई देने लगे हैं।
इन दृश्यों के आधार पर साधक की आंतरिक स्थिति, जरूरत और गति का अंदाज लगता है। पर उस बारीकी में जाना अभी जरूरी नहीं है। मुद्दे की बात यह है कि इन अनुभवों पर रुक जाना नहीं है। सिद्धि या साधना के मार्ग पर आगे तक बढ़ चुके संत महात्माओं का अनुभव तो यह है कि इन अनुभवों का होना जरूरी है।
इन अनुभवों या उपलब्धियों को विभूति या सिद्धि कहते हैं। एक अरसे तक योग अभ्यास के बाद भी ऐसी शक्तियां या अनुभव हासिल नहीं होते तो मानना चाहिए कि ठीक मार्ग पर नहीं चल रहा है। परंतु सिद्धियों में कोई जादू की बात नहीं है। इंद्रियों की शक्ति बहुत अधिक है परंतु साधारणत: हमको उसका ज्ञान नहीं होता और न हम उससे काम लेते हैं।
बहरहाल उन अनुभवों या उपलब्धियों में उलझे बिना आगे बढ़ते रहने पर कोई मंजिल मिलती है। वरना तो रास्ते में आगे बढ़ने के बजाय मील के पत्थर पकड़ कर ही रुक जाने वाली मिसाल बनती है।