हम लोग बहुत सी बातों की तरफ ध्यान नहीं देते। उनमें से एक बड़ी बात यह है कि हम करना तो साधना चाहते हैं, हम लगन तो ईश्वर से लगाना चाहते हैं, लेकिन हमारे चिंतन का, हमारी बातचीत का जो विषय होता है, वह साधना या ईश्वर संबंधी नहीं होता है। ख्याल कीजिए, आप जब भी बातचीत करते हैं, तब आप किसके बारे में बातचीत करते हैं? अपने बारे में या दूसरों के बारे में?
सच तो यह है कि तुम अपने आपको छोड़कर और सभी के बारे में बात करते रहते हो। अगर मैं आपसे कहूं कि 'आप मेरे पास बैठो और मेरे साथ बातचीत करो, लेकिन शर्त यह रहेगी कि बातचीत का मुद्दा कोई अन्य व्यक्ति नहीं होना चाहिए। हम किसी दूसरे के बारे में बात नहीं करेंगे, यही हमारी बातचीत का मुद्दा होगा।
आप कह सकते हैं कि 'ठीक है, हम किसी और के बारे में बात नहीं करेंगे।' मैं बता देती हैं कि आपके पास चर्चा करने का कोई विषय नहीं बचेगा। आप मौन हो जाएंगे। साधना की ओर बढ़ जाएंगे।
यह बात इसलिए कह रही हूं कि जिसका मन 'दूसरों' में अटका पड़ा है, वह साधक नहीं हो सकता। 'साधक उसी को कहते हैं जो दूसरों के बारे में विचार नहीं करता, जो दूसरों के बारे में बातचीत करने को राजी ही नहीं है।
साभारः आनंदमूर्ति गुरूमां (मन के पार) पुस्तक से