शरीर आत्मा का मंदिर है। उसकी स्वस्थता, स्वच्छता और सुविधा के लिए कार्य करना उचित एवं आवश्यक है। पर यह अहितकर है कि केवल मात्र शरीर के ही बारे में सोचा जाए, उसे अपना स्वरूप मान लिया जाए और अपने वास्तविक स्वरूप को भुला दिया जाए।
अपने आपको शरीर मान लेने के कारण शरीर के हानि-लाभों को भी अपने हानि-लाभ मान लेता है और अपने वास्तविक हितों को भूल जाता है। यह भूल-भुलैया का खेल जीवन को बड़ा कर्कश और नीरस बना देता है। आत्मा शरीर से पृथक् है। शरीर और आत्मा के स्वार्थ भी पृथक हैं।
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शरीर के स्वार्थों का प्रतिनिधित्व इन्द्रियां करती हैं। दस इन्द्रियां और ग्यारहवां मन यह सदा ही शारीरिक दृष्टिकोण से सोचते और कार्य करते हैं। स्वादिष्ट भोजन, बढ़िया वस्त्र, सुंदर मनोहर दृश्य, मधुर श्रवण, रूपवती स्त्री, नाना प्रकार के भोग-विलास यह इन्द्रियों की आकांक्षाएं हैं। इन्हीं इच्छाओं को तृप्त करने में प्रायः सारा जीवन लगता है।
जब यह इच्छाएं अधिक उग्र हो जाती हैं तो मनुष्य उनकी किसी भी प्रकार से तृप्ति करने की ठान लेता है। उचित अनुचित का विचार छोड़कर जैसे भी बने स्वार्थ साधने की नीति पर उतर आता है।
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यही समस्त पापों का मूल केंद्र बिंदु है। काम और लोभ अधिक से अधिक क्यों न मिले, इससे कोई तृप्त नहीं होता। इनसे जितना सुख मिलता है उससे कई गुना दुख भी साथ-साथ उत्पन्न होता है। इस प्रकार शरीरिक दृष्टिकोण मनुष्य को, पाप, ताप, तृप्ति तथा परम अशांति की ओर घसीट ले जाता है।