आज, हर प्राणी प्रसन्न रहना चाहता है। चाहे धन, शक्ति और सेक्स जो कुछ भी आपको चाहिये वह प्रसन्नता के लिये ही चाहिये। हमें प्रसन्न रहने के लिये कुछ ना कुछ खोजना होता है। लेकिन उसे प्राप्त करने के बाद भी हम प्रसन्न नही होते।
एक विद्यालय जाने वाला विद्यार्थी सोचता है कि जब वह कालेज जाएगा तो प्रसन्न हो जायेगा, वह स्वतंत्र हो जाएगा। अब आप एक कालेज जाने वाले छात्र से पूछो कि क्या वह प्रसन्न है, वह सोचता है कि जब उसे कोई नौकरी मिल जायेगी तब वह प्रसन्न हो जायेगा।
एक ऐसे व्यक्ति से बात करो जो कि नौकरी में लगा हुआ है, आप देखेंगे कि वह एक जीवनसाथी की तलाश में है। जिसके पास जीवनसाथी है वह बच्चों के लिये सोच रहा है। जिनके पास संतान हैं उन से पूछो कि क्या वह प्रसन्न हैं तो वह कहेंगे कि जब तक बच्चे व्यवस्थित नही हो जाते वे कैसे प्रसन्न रह सकते हैं।
अब ऐसे किसी व्यक्ति से पूछो जो कि रिटायर हो चुका है और अपनी सभी जिम्मेदारियों को पूरा कर चुका है। अब वह उन दिनों की चाहत में खोया होगा जब वह जवान था। तनाव हर किसी के जीवन में अपना स्थान बना चुका है।
सभी का जीवन भविष्य में किसी तरह की प्रसन्नता की तैयारी कर रहा है।
यह उसी तरह है कि पूरी रात सोने की तैयारी करते रहे लेकिन सो नही पाएं। जीवन कभी-कभी बहुत जटिल लगने लगती है। यहां पर प्रसन्नता है, दुख है, पीड़ा है, उदारता है, लोभ, राग और वैराग्य है। जब इतने सारे विपरीत मूल्य हो तो मस्तिष्क इन सबको संभाल नही पाता है और टूट जाता है।
ऐसे समय में गुरू काम आते हैं
जब व्यक्ति टूटने लगता है तब उसे ऐसी बुद्घिमता की आवश्यकता होती है जो उसे विपरीत समय में मार्गदर्शन दे सके। गुरु ही वह बुध्दिमता है। आप ने ध्यान दिया होगा कि जब आप किसी भी प्रकार की परेशानी में नही हो तब आप बहुत गहरी राय प्रकट करते हैं लेकिन यदि वही स्थिति आपके साथ हो तब वह सही नही लगती।
आपको पता है बुद्घि तभी प्रकट होती है जब कठिनाइयों से बाहर होते हैं। गुरु वही है जो किसी भी कठिनाई में नही है। वह कठिनाइयों को देखते है, उनके बीच में रहकर। गुरु एक सर्किट ब्रेकर की तरह है। जब आप जीवन को संभाल नही सकते, आपके गुरु आते हैं और आपकी रक्षा करते हैं ताकि आप संतुलित रह सको।
यदि कोई आपके साथ हो और लगातार इच्छाओं के लिये मजबूर कर रहा हो तो गुरु आपको शांति प्रदान करते हैं। आप अपनी सभी इच्छाएं और पीड़ा गुरु को समर्पित कर दें। गुरु प्राप्ति का अर्थ है सदैव विश्राम में रहना और मुस्कुराना, आत्मविश्वास से चलना, निर्भय होकर रहना और एक दृष्टि का होना, यही बुध्दिमता है।
साभारः आर्ट ऑफ लिविंग
श्री श्री रविशंकर परिचय
मानवीय मूल्यवादी, शांतीदूत और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर, का जन्म 13 मई 1956 को तमिलनाडु के पापानासम में हुआ था। इनके पिता आरएसवी रत्नम ने इनकी आध्यात्मिक रुचि को देखते हुए इन्हें महर्षि महेश योगी के सान्निध्य में भेज दिया।
महर्षि के अनेकों शिष्यों में से रवि उनके सबसे प्रिय थे। 1982 में रवि शंकर दस दिन के मौन में चले गए। कुछ लोगों का मानना है कि इस दौरान वे परम ज्ञाता हो गए और उन्होंने सुदर्शन क्रिया (श्वास लेने की तकनीक) की खोज की।