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सीख: हमें अपनी जिंदगी जीने की शर्ते खुद ही तय करनी पड़ती है

Wed, 03 Jan 2018 08:43 AM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला
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कमलेश ऑफिस से निकल रहा था। वह घर जल्दी पहुंचना चाहता था, इसलिए उसने टैक्सी बुक की थी। वह सॉफ्टवेयर इंजीनियर था, पर पिछले कुछ महीनों से वह लगातार देर से ही घर पहुंच पाता था। कुछ दिन पहले उसके जन्मदिन पर उसकी पत्नी ने उसके दोस्तों को खाने पर बुलाया था। उस दिन भी कमलेश रात दस बजे ही घर पहुंच पाया था। पत्नी उससे बहुत नाराज थी। उसे लगता था, कमलेश जान-बूझकर ऐसा कर रहा है। आज भी ऑफिस से निकलने में ही आठ बज चुके थे। जबकी उसने पत्नी से छह बजे घर आने का वायदा किया था।

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कमलेश टैक्सी में बैठा ही था कि टैक्सी ड्राइवर को कोई फोन आ गया। वह गाड़ी चला रहा था, इसलिए उसने अपना फोन स्पीकर पर ले लिया। फोन किसी बहुराष्ट्रीय सॉफ्टवेयर कंपनी से था, जो किसी अवनीश से बात करना चाह रहा था और उसे वाई-फाई नेटवर्क सही करने के लिए दस साल का कांट्रैक्ट देना चाह रहा था। ड्राइवर बोला कि वही अवनीश है, पर अब उसने वह काम बंद कर दिया है और अभी बात नहीं कर सकता, क्योंकि वह गाड़ी चला रहा है।
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जब ड्राइवर ने फोन रखा, तो कमलेश ने पूछा कि क्या इस नेटवर्क की कंपनी आपकी ही थी। ड्राइवर बोला, जी, पिछले महीने तक मैं एक नेटवर्क की कंपनी चलाया करता था। हम कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों को वाई-फाई नेटवर्क दिया करते थे। लेकिन अब हमने वह कंपनी बंद कर दी है। कमलेश ने पूछा, पर क्यों, वह काम तो अच्छा था। ड्राइवर बोला, ऐसे काम का क्या फायदा, जो परिवार से अलग कर दे। मैं दिन रात कंपनी के कामों में लगा रहता था। मेरे बच्चे कब बड़े हो गए, मुझे पता भी नहीं चला। इसीलिए मैंने तय किया कि मैं अब टैक्सी चलाऊंगा। काम भर का खर्च निकल आता है। जब मन होता है, चलाता हूं, जब मन होता है, गाड़ी खड़ी कर देता हूं। चैन की जिंदगी तो है। ड्राइवर की बातों ने कमलेश को खामोश कर दिया

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