वो पैदा तो आम इंसानों की तरह हुए। न उनके दस हाथ थे और न उनके हाथों में अस्त्र-शस्त्र थे। न उनके पास ऐसी कोई अदृश्य शक्ति थी, लेकिन वो फिर भी भगवान हो गए। पूजे जाने लगे। ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बीच उनकी भी तस्वीरें रखी जाने लगीं।
हो सकता है कि उन्होंने लोगों का दिल जीत लिया हो या उनकी बातों में ऐसा जादू हो कि लोगों ने उन्हें भगवान मान लिया।
नए भगवानों ने लोगों की आस्था और विश्वास का खूब फायदा भी उठाया। कई बार विवादों में भी रहे। कहने को भगवान थे लेकिन विवाद हुआ संपत्ति को लेकर या फिर धन को लेकर। कभी उनके कारनामों ने बदनाम किया तो कभी उनके परिवारजनों के कारनामों ने।
लेकिन ज्यादातर ये हुआ कि लोगों की आस्था और श्रद्धा पर कोई फर्क नहीं पड़ा। कुछ लोग कटे तो उससे अधिक जुड़ गए।
आइये यहां कुछ ऐसे ही इंसान से भगवान बने मनुष्यों के कारनामे देखते हैं।
शिव को गुरु बनाकर बने भगवान हरींद्रानंद महाराज
इन दिनों शिव भक्तों का एक अलग समूह बनता जा रहा है जो अपने आपको भगवान शिव के शिष्य के रुप में देखते हैं और शिव को गुरू मानकर उनकी भक्ति करते हैं। इस समूह के लोग भगवान शिव के साथ अपने एक गुरु की भी पूजा करते हैं जिनका नाम है हरींद्रानंद महाराज।
यह शिवगुरु समूह के संस्थापक हैं। शिवगुरु परिवार से जुड़े सदस्य अपने घरों पर शिव चर्चा का अयोजन करते हैं जिसमें भगवान शिव का भजन गायन किया जाता है। इसके साथ ही हरींद्रानंद महाराज की भी पूजा और आरती करते हैं। इस समूह के लोगों का मानना है कि हरींद्रानंद महाराज ही पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने शिव को गुरु माना। शिव के प्रथम शिष्य होने के नाते शिवगुरु परिवार के सदस्य इनकी पूजा करते हैं।
इनकी पूजा में एक बड़ा ही रोचक दृश्य देखने को मिलता है।
जिनके घर में शिव चर्चा का आयोजन किया जाता है वह शिव जी और हरींद्रानंद महाराज की तस्वीर के सामने एक थाली में हलवा, मिसरी या भूने हुए आटे में चीनी मिलाकर प्रसाद रखते हैं। जब भजन गायन हो जाता है तो लोग देखते हैं कि प्रसाद में कौन सी आकृति उभरी है। लोग बताते हैं कि इस प्रसाद में कभी भगवान शिव का डमरू तो कभी त्रिशूल दिखता है। कुछ लोग यह भी बताते हैं कि उन्हें शिव के नेत्र भी प्रसाद में नजर आते हैं।
हालांकि इसकी पुष्टि अभी तक नहीं हुआ है और न इसका कोई वैज्ञानिक आधार दिखाई देता है।
गुरु को जपते-जपते खुद बन गए महागुरू
उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में 1896 ई. संत जय गुरुदेव का जन्म हुआ था। हलांकि उनका वास्तविक नाम तुलसीदास था। लेकिन इस नाम से इन्हें बहुत कम लोग ही जानते हैं। इनके गुरू थे अलीगढ़ के चिरौली ग्राम निवासी धूरेलाल जी।
तुलसीदास किस तरह से जय गुरुदेव बन गए इसकी बड़ी रोचक कथा है। कहते कि तुलसीदास हमेशा जय गुरुदेव का नाम जपा करते थे इसलिए इनके अनुयायियों ने उन्हें जय गुरुदेव कहना शुरू कर दिया। उनका कहना था कि दुनिया में हर समस्या का हल संभव है बस जब कभी समस्या आ जाए तो जय गुरुदेव का ध्यान करना चाहिए। इस तरह गुरू का नाम रटते-रटते यह खुद ही भक्तों के भगवान बन गए।
जय गुरू का राजनीति में भी काफी दखल रहा है। आपातकाल के दौरान 1975 में यह जेल भी गए। 1980 में इन्होंने अपनी एक पार्टी भी बना ली जिसका नाम था - दूरदर्शी पार्टी। 1984 और 1889 में लोकसभा के चुनाव में इस पार्टी ने अपने प्रत्याशी चुनाव में उतारे लेकिन सभी प्रत्याशियों को चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा। राजनीति में असफलता का स्वाद चखने के बाद जय गुरुदेव ने राजनीति से खुद को अलग कर लिया।
जय गुरुदेव का आश्रम मथुरा जिले में आगरा-दिल्ली राजमार्ग पर स्थित है। आश्रम डेढ़ सौ एकड़ जमीन पर बना हुआ है। यह आश्रम जमीन विवाद को लेकर काफी सुर्खियों में रहा। 18 मई 2012 को जय गुरुदेव का निधन हो गया।
संभोग को जिसने समाधि का रास्ता बताया
1960 से 1990 के दशक में एक दार्शनिक संत खूब चर्चा में रहे। इस संत का नाम है ओशो। वैसे उनका नाम था रजनीश। जन्म 11 दिसम्बर 1931 को मध्य प्रदेश में रायसेन में हुआ था। ओशो ने आध्यात्म और संन्यास की नई परिभाषा गढ़ी। इन्होंने बताया कि परिवार और समाज में रहते हुए जीवन के दायित्वों का निर्वाह करना ही सच्चा संन्यास है। इनका मानना था कि संन्यास वह नहीं है कि भगवा वस्त्र पहन लिया और लोगों को उपदेश देना शुरू कर दिया। इस तरह के संन्यास को ओशो ने पाखंड बताया। ओशो ने जो संन्यास की परिभाषा बतायी उसे इन्होंने नव संन्यास का नाम दिया।
संन्यास की तरह इन्होंने प्रेम की भी अलग परिषाभा गढ़ी। इन्होंने बताया कि प्रेम बंधन का नाम नहीं है। प्रेम जब खुला होता है, जिसमें बंधन नहीं होता है वह प्रेम मंदिर के समान होता है। लेकिन जब प्रेम समर्पित हो जाए उसे एक मात्र प्रेमी के अलावा अन्य के साथ हंसने-बोलने की इजाजत नहीं हो तब वह प्रेम कारावास बना जाता है। इन्होंने प्रेम को ही प्रार्थना कहा। कहा जाता है कि उनके आश्रम में बहुत उन्मुक्त वातावरण था और भक्तों को किसी के साथ भी संभोग करने की छूट थी।
ओशो ने सैकड़ों पुस्तकें लिखीं, हजारों प्रवचन दिये। उनके प्रवचन पुस्तकों, आडियो कैसेट तथा वीडियो के रूप में उपलब्ध हैं। 'संभोग से समाधि की ओर' इनकी सबसे चर्चित और विवादित पुस्तक है।
अपने क्रान्तिकारी विचारों से इन्होने लाखों अनुयायी और शिष्य बनाये। और अपने शिष्यों के बीच भगवान बन बैठे। लोगों ने इन्हें ओशो भगवान या भगवान रजनीश भी कहना शुरू कर दिया।
वे अमरीका चले गए जहां उनकी आलीशान जीवन शैली चर्चा का विषय रही।
खुद को साईं बाबा का अवतार बताकर बने भगवान
आंध्र प्रदेश का पुट्टपर्थी गांव एक तीर्थ स्थान बन चुका है। क्योंकि यहां पर 23 नवंबर 1926 एक ऐसे व्यक्ति ने जन्म लिया जिसने खुद को शिरडी के साईं बाबा का अवतार बताया। पुट्टपर्थी में ही इन्होंने अपना आश्रम बनाया और दूसरे साईं बाबा बनकर लोगों के द्वारा पूजे जाने लगे। इनके भक्तों में सचिन तेंदुलकर सहित दर्जनों नामी गिरामी लोगों का नाम शामिल है।
इनका वास्तविक नाम सत्यनारायण राजू था। वो दावा करते रहे कि उनके भीतर बचपन से ही कई चमत्कारी शक्तियां थीं। यह हवा में हाथ हिलाकर मिठाई एवं खाने-पीने की कई चीजें पैदा कर देते थे। हालांकि लोगों ने कई बार उनके इस चमत्कार का भंडाफोड़ कर दिया और बताया कि वे किस तरह हाथ की सफाई का प्रयोग करके चमत्कार पैदा करते थे। साईं बाबा के अवतार से धीरे-धीरे वे ख़ुद भगवान की तरह स्थापित हो गए और उनका नाम हो गया सत्य साईं बाबा।
इनके जीवन काल में इनके ऊपर यौन दुर्व्यवहार और लोगों को बरगलाने के आरोप लगते रहे हैं। उनके आश्रम में कथित स्कैंडलों की भी खबरें सामने आईं। बाबा के खिलाफ यौन व्यवहार संबंधी सवाल भी खड़े होते रहे। हांलाकि बाबा ने इसे उनके विरोधियों की साजिश कहकर खारिज कर दिया था।
24 अप्रैल 2011 को सत्य साईं बाबा का 84 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वे अपने पीछे अकूत संपत्ति का भंडार छोड़ गए।