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सीख: रिश्तों की गांठें सुलझाने के लिए संवाद है जरूरी

Fri, 30 Mar 2018 03:04 PM IST
धर्म डेस्क, अमर उजाला
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कीर्ति और शैली बचपन में हमेशा साथ रहीं। उनकी दोस्ती इतनी मजबूत थी कि बीस साल बाद भी जब वे मिलीं, तो उनके दिलों में एक दूसरे के लिए उतना ही प्रेम था। कीर्ति पति रोहन के साथ ऑस्ट्रेलिया में रहती थी, जबकी शैली भारत से खास तौर पर उनसे मिलने आई थी। उन लोगों ने एक-दूसरे के साथ बहुत अच्छा वक्त बिताया और शैली ने अपनी जिंदगी से जुड़ी हरेक बात कीर्ति से साझा की। मगर शैली जब भी कीर्ति से अपने बारे में कुछ बताने को कहती, तो वह कहती, मेरे पास बताने को ऐसा कुछ है ही नहीं। 

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एक दिन कीर्ति और रोहन के बीच में काफी तेज बहस हो गई। यह देखकर शैली बहुत दुखी हो गई। कुछ देर बाद शैली ने कीर्ति से पूछा, क्या तुम्हारी शादी ठीक नहीं चल रही? मैंने तुम लोगों की लड़ाई सुनी।तुमने मुझे यह बात क्यों नहीं बताई? अगर तुम लोगों में इतना मतभेद है, तो क्या अलग हो जाना बेहतर नहीं होगा? शैली की बात सुनकर कीर्ति जोर-जोर से हंसने लगी और उसने तुरंत रोहन को भी वहां बुला लिया। रोहन भी कीर्ति के साथ हंसने लगा। रोहन बोला, शैली, हमारा हर रिश्ता ऐसा ही होता है।

 किन्हीं भी दो लोगों को ले लो, फिर वह मां-बेटी हो या तुम दोनों जैसी अच्छी सहेलियां, क्या हमारी सोच एक जैसी हो सकती है? हम अलग-अलग सोच से ही सीखकर आगे बढ़ते हैं। कई बार हमें एक-दूसरे की बातें चुभती भी हैं, पर यही बातें हमें सोचने को मजबूर भी करती हैं। यही बातें तो हमारा पूरक होती हैं। कई बार हम सिर्फ एक ही पहलू देख पाते हैं। पर यही वाद-विवाद हमें दूसरे पहलू का भी एहसास दिलाता है। अगर वाद-विवाद न हो, तो लोग एक-दूसरे से कुछ सीखेंगे ही नहीं। ठीक उसी तरह से कीर्ति और मैं, आपस में जितना भी लड़ लें, हम एक दूसरे का बहुत सम्मान करते हैं। एक दूसरे से बेइंतहा प्रेम करते हैं। हां, अगर हम चुप हो जाते, एक दूसरे से बातें छिपाने लगते, तो जरूर सोचने का विषय होता। फिर तीनों ठहाके मारकर हंसने लगे।

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